विश्व को संस्कृति भारत ने दी सर्वे संतु निरामया सर्वे भवंतु सुखिनः का भाव विश्व को भारत ने दिया
रतलाम। विश्व हिन्दू परिषद् के शिक्षा वर्ग में पिछली 25 मई से शिक्षा ले रहे 100 से अधिक कार्यकर्ताओं को आज कुटुम्बप्रबोधन में के विषय पर संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रान्त संघचालक प्रकाश शास्त्री ने कहा कि हमारी पारिवारिक व्यवस्था कैसी थी और हम विदेशी संस्कृति को अपना कर अपने परिवार को कैसे नष्ट कर रहे है, हमारी हिन्दू कुटुम्ब संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को मानते है।
हम जब भी हमरे परिवार की बात करते है, तब हम हमारे सारे पारिवारिक रिश्तो की बात करते है, माता पिता से प्रारम्भ रिश्ते नाना नानी तो दादा दादी तक ही नहीं रुके, अनेक रिश्ते हमें हिन्दू कुटुम्ब में मिलेंगे।
जब हमारे ऋषि मुनि विश्व में हमारी सँस्कृति, परम्परा के प्रचार करने गये तो यही मंत्र के साथ *अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम्* ॥ अर्थ – यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त (सञ्कुचित मन) वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

प्रकाश ने आगे कहा कि आज देखा जा रहा है, कि समाज भ्रष्ट होता जा रहा है, जैसा कि उनके नेतृत्व करने वाला है, भ्रष्टाचार छोटी इकाई में आ गया है, जिससे वह समाज में दिखाई देने लगा है, इसलिए छोटी इकाई सही हो जाएगी तो बड़ी इकाई स्वतः ही सही हो जाएगी।
पश्चिमी देशों में समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति है, व्यक्ति स्वयं के बारे में सोचता है वह समाज के बारे में नहीं सोचता, जिसके कारण से देखने मे आता है व्यक्ति में कुरीति आने के कारण समाज में कुरीतियाँ आ जाती हैं।
हमारी संस्कृति में गाय माता है, धरती भी माँ है, नदिया भी माँ है, पर्वत, वृक्ष भी पूजनीय हैं, इस प्रकार सभी हमारे परिवार संस्कृति का हिस्सा है।
हमारी संस्कृति में “सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया” अर्थात सभी सुखी हूं सभी निरोगी हों का मंत्र दिया गया है।
हमारे यहां जन्म से मृत्यु तक 16 संस्कारों का वर्णन किया गया है सभी संस्कार जीवन में महत्चपूर्ण और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है।
हमारी संस्कृति में सभी को समान माना गया है।
– इंदौर से विनोद गोयल, नगर प्रतिनिधि की रिपोर्ट
