माता-पिता और शिक्षक संवेदनशीलता से लें काम* डाॅ. चन्दर सोनाने                                                           पिछले दिनों पेपरलीक पर देशभर में हुए छात्रों के हंगामें ने युवाओं की मानसिक दबाव की समस्या को फिर से सतह पर ला दिया है। इस संबंध में प्राप्त आंकड़ें इस संकट की भयावहता को प्रमाणित करते हैं। पिछले एक दशक में छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या में 80 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है। इस दौरान वर्ष 2014 से 2024 के बीच 1 लाख 23 हजार छात्रों ने आत्महत्या की है। यही नहीं करीब 13 हजार छात्र प्रति वर्ष जान गंवा रहे हैं। इस पर गंभीरता से सोचने, विचारने और चिंतन की आवश्यकता है।

एनसीआरबी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 20 प्रतिशत से अधिक आत्महत्या के पीछे का मुख्य कारण यह पाया गया है कि उन बच्चों पर पढ़ाई और परीक्षा का अत्यधिक दबाव था। पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर के अनुसार हर साल परीक्षा में विफलता के 1250 से 2000 के बीच आंकड़ें दर्ज किए गए है। 21 से अधिक अभ्यर्थियों ने तो केवल नीट परीक्षा रद्द होने और पर्चा लीक की घटनाओं के बाद अपनी जान दे दी थी।

अब सवाल यह उठता है कि छात्रों की आत्महत्या को रोकने के लिए कौन कोशिश करे और क्या प्रयास किए जाए ? निश्चित रूप से सबसे पहली जिम्मेदारी माता-पिता और परिवारजनों की है। यदि किसी कारणवश छात्र तनावग्रस्त है और उसके व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है तो इसे ध्यानपूर्वक देखने की पहली जिम्मेदारी छात्रों के माता-पिता की ही है। अब जमाना बदल गया है। इसलिए बच्चे जब स्कूल या काॅलेज पढ़ने जाते है, तो उनसे माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों को मित्रवत व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे अपनी समस्या को खुलकर सबसे पहले अपने परिवारजनों को ही बताएं, ताकि समय पर उसका निराकरण किया जा सके।

निश्चित रूप से स्कूल और काॅलेज की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, उससे इंकार नहीं किया जा सकता। स्कूल प्रबंधक को अपने स्कूल में इस प्रकार का वातावरण निर्मित करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए कि छात्र अपनी समस्या शिक्षक को निःसंकोच बता सके और शिक्षक को भी संवेदनशीलता के साथ छात्र की मानसिक स्थिति को समझते हुए उसकी समस्या को दूर करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह तभी संभव हो सकेगा जब छात्र और शिक्षक के बीच सीधा और आत्मीय संबंध हो, यह संबंध डर का बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यह संबंध आत्मीयता और स्नेह का होना चाहिए।

माता-पिता का परम कत्र्तव्य है कि वे अपने बच्चे को अपनी पसंद का विषय लेने और अधिक अंक लाने के लिए बाध्य नहीं करें। उसे उसकी पसंद का विषय लेने के लिए प्रेरित करें, उसमें वह अधिक रूचि के साथ पढ़ सकेगा और सफलता भी प्राप्त कर सकेगा। इसके साथ ही किसी परीक्षा विशेष में भले ही वह नीट की हो या कोई अन्य कोई प्रतियोगी परीक्षा हो यदि उसका पेपर खराब गया हो और उसे फेल होने का डर हो तो तुरन्त उसे सांत्वना दें और बताएं कि जीवन यहीं समाप्त नहीं हो जाता है। अगली बार और अधिक प्रयास करने से सफलता मिल सकती है। अथवा वर्तमान में अनेक विकल्प है उसे अपने बच्चे की रूचि के अनुसार उसे अपनाने के लिए प्रेरित करें। इससे मानसिक रूप से संबल मिलने से वह शांत हो सकेगा और गलत दिशा में नहीं जायेगा।

छात्र जब भी किसी मानसिक या शारीरिक तकलीफ में हो और जब भी वो माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों अथवा शिक्षकों से अपनी बात या समस्या को बताता है तो सबकी जिम्मेदारी होती है कि वे उस पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दें और बच्चे की बात ध्यान से सुनकर उसके निराकरण का प्रयास करें।

कई बार यह भी होता है कि स्कूल या काॅलेज में कोई छात्र या छात्रा को अन्य कोई छात्र बिना वजह परेशान करें और उसे मानसिक या शारीरिक रूप से क्षति पहुंचाने का प्रयास करंे तो सबसे पहले स्कूल प्रबंधन के द्वारा यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि शिक्षक छात्र की समस्या को ध्यानपूर्वक सुनंे और उसी समय संवेदनशीलता के साथ उसका निराकरण करने का प्रयास करंे। ऐसा भी होता है कि किसी छात्र विशेष को मोटा या दुबला पतला होने या चश्मा पहनने, अधिक पढ़ने या कम पढ़ने की बात को लेकर कोई छात्र विशेष या छात्रों के समूह द्वारा छात्र को परेशान किया जाता है, तो बच्चों को पहले से इतना समझा दिया जाना चाहिए कि वह अपनी समस्या को निःसंकोच शिक्षक और माता-पिता को बता दें ताकि अनहोनी के पहले ही उस समस्या का निराकरण किया जा सके।

यह भी हो सकता है कि छात्र विशेष को स्कूल या काॅलेज में या बाहर किसी आंदोलन में भाग लेने के कारण व्यक्ति विशेष या किसी राजनीतिक दल विशेष द्वारा परेशान करने का प्रयास किया जाए, तो छात्र डरे नहीं, बल्कि अपने माता-पिता को तुरंत वस्तुस्थिति बताएँ ताकि छात्र को प्रेम और स्नेह से उसकी मानसिक स्थिति से बाहर निकाला जा सके। यही नहीं व्यक्ति विशेष की शिकायत भी पुलिस थाने में करने में हिचक नहीं की जानी चाहिए।

केन्द्र शासन और राज्य शासन का भी दायित्व है कि वे स्कूल और काॅलेजो में ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करें कि जब भी कोई छात्र को कोई बेवजह परेशान और हैरान करंे तो उसके विरूद्ध सख्त कार्यवाही की जा सके। ऐसा नियम बनाकर और आदेश जारी कर भी किया जाना चाहिए। जब केन्द्र शासन, राज्य शासन, स्कूल और माता-पिता संयुक्त रूप से छात्र की मानसिक और शारीरिक समस्या को दूर करने का ठोस प्रयास करेंगे तब ही छात्रों की आत्महत्या पर विराम लग सकता है।