वृद्धाश्रमों के लिए हमारी संस्कृति में कोई जगह नहीं

वृद्धाश्रमों के लिए हमारी संस्कृति में कोई जगह नहीं


इंदौर, । पहले मकान कच्चे थे और माता-पिता हमारे साथ ही रहते थे लेकिन अब मकान की जगह महल तो बन गए और  माता- पिता वृद्धाश्रम तक पहुंचाए जाने लगे हैं।  भारतीय समाज, धर्म- संस्कृति और शिष्टाचार की दृष्टि से यह अत्यंत शर्मनाक स्थिति है। वृद्धाश्रम के लिए हमारी संस्कृति में कोई जगह नहीं होना चाहिए। हम यदि मां-बाप को सताएंगे तो हमारे बच्चे भी हमें नहीं छोड़ेंगे। भागवत केवल पोथी शास्त्र, ग्रंथ या किताब नहीं बल्कि साक्षात भगवान कृष्ण का स्वरूप है। भक्ति के लिए उम्र कहीं भी बाधक नहीं होती।
गीताभवन में गुरूवार से चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ एंव अष्टोत्तर शत भागवत पारायण के दिव्य आयोजन में महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद के सानिध्य में इंदौर की बेटी साध्वी कृष्णानंद ने उक्त प्रेरक बाते कही। कथा शुभारंभ के पूर्व वरिष्ठ समाजसेवी विनोद- नीना अग्रवाल, प्रेमचंद गोयल, श्याम अग्रवाल मोमबत्ती, गीताभवन के ट्रस्टी रामविलास राठी, बालकृष्ण छाबछरिया, श्रीमती रागिनी मक्कड़, विधायक रमेश मेंदोला आदि ने व्यासपीठ का पूजन कर भागवतजी की आरती में भाग लिया। संस्था अग्रश्री कपल्स गु्रप की ओर से अरूण गोयल मामा, ब्रजकिशोर अग्रवाल, किरण- अतुल बंसल, सपना कुलभूषण मित्तल, स्वाति-राजेश मंगल एवं शीतल- रवि अग्रवाल  ने अतिथियों की अगवानी की। गीताभवन में पहली बार इतने विद्वान भागवत का मूल पारायण कर रहे हैं। श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन अनेक परिजन यहां आ कर अपने दिवगंत परिजनों की स्मृति में भागवतजी का पूजन कर रहे हैं। साध्वी कृष्णानंद ने भी कहा कि गीताभवन जैसे तीर्थ स्थल पर श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त किया जा रहा यह अनुष्ठान कई गुना अधिक फल देने वाला है।
भागवत कथा में ध्रुव के भक्ति प्रसंग की भावपूर्ण व्याख्या करते हुए साध्वी कृष्णानंद ने कहा कि भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती । भक्ति के लिए अवस्था बाधक नहीं होती। वृद्धावस्था में जब हाथपांव और अन्य अंग काम नहीं कर रहे हो, तब की गई भक्ति सार्थक नहंी होगी। भारतीय संस्कृति में वृद्धाश्रम के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। यह माताओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने बेटों को श्रेष्ठ संस्कार प्रदान करंे। आज हमारे परिवार बिखर रहे हैं, बुजुर्गों का सम्मान घट रहा है। पहले कच्चे मकान होते थे और पूरा परिवार साथ रहता था, अब महल बन गए हैं लेकिन माता-पिता वृद्धाश्रम भेजे जा रहे हैं। जो व्यवहार आज हम अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, कल वहीं घटनाक्रम हमारे साथ भी गुजर सकता है।  आजकल के बच्चे कहते है कि हम माता – पिता को रख रहे हैं। उन्हे कहना चाहिए माता-पिता के साथ हम रह रहे हैं। यह बहुत शर्मनाक और दयनीय स्थति है कि आज सनातन धर्म के प्रति हम लोग उदासीन बने हुए हैं। धर्म और संस्कृति हमारे आधार स्तंभी है। यदि हमारी नींव खोखली हो गई तो आने वाले दिनों में नई पीढी़ को बहुत बुरे दिन देखना पड़ सकते हैं।