साधना और संयम के पथ पर चलकर ही संवारा जा सकता है जीवन

साधना और संयम के पथ पर चलकर ही संवारा जा सकता है जीवन


इंदौर । जैन दर्शन और चिंतन तप, त्याग और साधना पर आधारित है। साधना और संयम के पथ पर चलकर ही जीवन को संवारा और सुलझाया जा सकता है। जिन आराधकों ने अपने दृढ़ संकल्प से चातुर्मास के इन पवित्र दिनों में तपस्या का संकल्प किया है, वे सचमुच सौभाग्यशाली है। कोरोना त्रासदी के शिकार होने के बावजूद भी अनेक तपस्वियों ने अपने उपवास का संकल्प पूरा किया है, उनकी तपस्या भी वंदनीय है। आज इतने सारे तपस्वियों को एक साथ देखकर महावीर बाग की यह भूमि भी धन्य हो गई है।
ये प्रेरक विचार हैं उपाध्याय प्रवर प.पू. प्रवीण ऋषि म.सा. के, जो उन्होंने आज एरोड्रम रोड स्थित आनंद समवशरण, महावीर बाग में चातुर्मास के दौरान उपवास एवं अन्य तप करने वाले साधकों का अभिनंदन करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में उस वक्त हर्ष हर्ष की मंगल ध्वनि गूंज उठी, जब भीम (राजस्थान) की एक 9 वर्षीय बालिका नेहा को एक सुसज्जित डोली में बिठाकर सभा स्थल पर लाया गया। इस बालिका ने महासती आदर्श ज्योति म.सा. की प्रेरणा से इतनी कम उम्र में नौ दिन का उपवास रखा और अपने दादाश्री लक्ष्मणसिंह रावत के साथ पहंुचकर उसने संयम और साधना के मार्ग पर चलने तथा उपाध्यायश्री प्रवीण ऋषि म.सा. से जैन धर्म की दीक्षा लेने की इच्छा भी व्यक्त की। नेहा के माता-पिता नहीं है। नेहा के दादाश्री ने इस मौके पर नेहा को महासती आदर्श ज्योति म.सा. को सौंपते हुए उसे दीक्षा दिलाने के लिए उपाध्यायश्री को आज्ञापत्र भी भेंट किया जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि वे जब चाहें, उपयुक्त अवसर पर नेहा को दीक्षा दिला सकेंगे। यही नहीं, नेहा के साथ उसका छोटा भाई चिंटू भी इस अवसर पर मौजूद था और दादा लक्ष्मणसिंह रावत ने उसे भी कुछ समय बाद जैन धर्म की सेवा में समर्पित करने का संकल्प व्यक्त किया। सभा में इस त्याग के लिए लक्ष्मणसिंह का श्री वर्धमान श्वेतांबर स्थानकवासी जैन श्रावक ट्रस्ट की ओर से अचल चौधरी, रमेश भंडारी, प्रकाश भटेवरा, संतोष जैन, जिनेश्वर जैन, सुमतिलाल छजलानी, शैलेष निमजा, श्रीमती सुनीता छजलानी, मधु भटेवरा आदि ने सम्मान भी किया। आनंद तीर्थ महिला परिषद की ओर से बहनों ने भी नेहा की अगवानी की।
कार्यक्रम के अगले चरण में उन सभी तपस्वियों की भी अनुमोदना की गई, जिन्होंने दस, नौ, आठ, सात एवं तीन दिनों के लिए उपवास रखकर स्वयं को संयम और साधना के पथ पर अग्रसर किया। ऐसे आराधकों की संख्या लगभग 150 थी। इनमें अजमेर, जोधपुर, चैन्नई के अलावा इंदौर एवं मालवांचल के आराधक भी बड़ी संख्या में शामिल थे। जिन तपस्वियों ने नौ उपवास किए, उनमें श्रीमती मधु मंडलिक (10 उपवास), मंजुलाबेन आंचलिया, अंजुरी जैन, बबीता पीतलिया, शोभना कोठारी, अल्पना धाकड़, लविना जैन, सपना जैन, आशा कोठारी, पलक हरकावत, मनीषा, दीपा देशरडा, सपना मूणोत, वनिता जैन, प्राची नाहर, मधुबाला नाहर, संगीता सकलेचा, छाया सकलेचा, स्वाति वोहरा, किरण जैन एवं मधुबाला छाजेड़ तथा पुरूषों में जयेश मेहता (मास क्षमण की ओर अग्रसर), नरेंद्र राठौर जैन, नेमीचंद आंचलिया, सचिन चौरड़िया, मनोज सकलेचा, महेंद्र सकलेचा, सुरेश गुगले, रतनलाल सोनी, राजेंद्र वाघमार, सिद्धार्थ जैन के नाम प्रमुख हैं। संचालन हस्तीमल झेलावत ने किया।