रतलाम । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत रविवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
अपने उद्बोधन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने धर्म, कर्तव्य, संस्कार और जीवन में संयम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ब्राह्मण वेद और कर्मकांड का मंदिर है, वहीं राजा विष्णु के स्वरूप के समान होता है। राजा का दायित्व है कि वह अपनी प्रजा को पुत्र के समान मानकर उसका पालन-पोषण और संरक्षण करे। इसी प्रकार समाज के प्रत्येक वर्ग का अपना विशिष्ट धर्म और कर्तव्य है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होता है तो समाज की व्यवस्था कमजोर होने लगती है।
परीक्षित और कलियुग का प्रसंग
आचार्यश्री ने राजा परीक्षित और कलियुग की कथा सुनाते हुए कहा कि राजा परीक्षित ने कलियुग को सीमित स्थानों में रहने की अनुमति दी थी। कथा के अनुसार कलियुग ने अंततः स्वर्ण में अपना निवास स्थान प्राप्त किया। स्वर्ण अर्थात धन और उसके प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य के विवेक को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि मुकुट धारण करने के साथ ही राजा परीक्षित के जीवन में कलियुग के प्रभाव का प्रसंग सामने आया और इसके बाद घटनाक्रम उन्हें उस परीक्षा की ओर ले गया, जिसने आगे चलकर श्रीमद्भागवत कथा के प्राकट्य का मार्ग बनाया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में भी यही स्थिति है। जब अहंकार, लोभ, मोह और विषय-वासनाएं विवेक पर हावी हो जाती हैं तो व्यक्ति धर्म के मार्ग से विचलित होने लगता है।
अपने धर्म और कर्तव्य का पालन जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि ब्राह्मण का तेज उसके वेदाध्ययन, संस्कार और आचरण में है। क्षत्रिय का धर्म साहस, पराक्रम और समाज की रक्षा करना है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग का अपना कर्तव्य है। केवल बाहरी प्रतीकों से धर्म की सार्थकता नहीं होती, बल्कि उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है।
उन्होंने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि आज नेताओं, व्यापारियों और साधु-संतों सहित समाज के प्रत्येक वर्ग को आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। जब धर्म और कर्तव्य की जगह स्वार्थ और दिखावा ले लेते हैं, तब समाज की वास्तविक शक्ति कमजोर पड़ती है।
नचिकेता की परीक्षा का उल्लेख
कठोपनिषद के प्रसंग से जोड़ते हुए आचार्यश्री ने नचिकेता की कथा भी सुनाई। उन्होंने कहा कि नचिकेता की परीक्षा स्वयं यमराज ने ली थी। नचिकेता ने सांसारिक सुख-सुविधाओं के बजाय सत्य और आत्मज्ञान को महत्व दिया। उसकी दृढ़ता और जिज्ञासा से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे तीन वर प्रदान किए और आत्मविद्या का गूढ़ ज्ञान दिया।
उन्होंने कहा कि साधक की वास्तविक परीक्षा परिस्थितियों में होती है। जो व्यक्ति प्रलोभन, भय और मोह के बीच भी अपने लक्ष्य एवं धर्म पर स्थिर रहता है, वही जीवन के वास्तविक सत्य को प्राप्त कर सकता है।
शिव-पार्वती प्रसंग से समझाया दिखावे का महत्वहीन होना
आचार्यश्री ने सावन और भगवान शिव-पार्वती के प्रसंग के माध्यम से कहा कि संसार में दिखाई देने वाला आकर्षण और वास्तविक सत्य अलग-अलग हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि बाहरी दिखावे के पीछे भागने के बजाय मनुष्य को अपने भीतर श्रद्धा, दया, धर्म और सत्य को विकसित करना चाहिए।
उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती के प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर के प्रति प्रेम केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता और समर्पण का विषय है।
दया को बताया धर्म का मूल
प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि “दया धर्म का मूल है।” दया, करुणा, सत्य, संयम और सेवा भाव के बिना धर्म केवल कर्मकांड बनकर रह जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में धर्म को व्यवहार का हिस्सा बनाएं और दूसरों के प्रति करुणा एवं सद्भाव रखें।
प्रवचन के दौरान विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की ओर से आचार्य महामंडलेश्वर जी का सम्मान किया गया। इसके पश्चात आश्रम परिसर में आरती संपन्न हुई तथा श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई।
प्रसादी के लाभार्थी भगवती लाल सोलंकी (स्टेशन वाले) एवं मनोरमा देवी-रमेश चंद्र राठौड़ (शहर सराय) रहे। कार्यक्रम में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।