मध्यप्रदेश हो या देश के अन्य राज्य, सभी राज्यों में पीने के पानी के लिए लोग परेशान है। अधिकतर गाँव और शहरों में लोग पीने के पानी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। चारों ओर भीषण गर्मी पड़ रही है। ऐसे में पीने के पानी की व्यवस्था करना आमजन के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
आइए, कुछ गाँवों और शहरों का जायजा लेते हैं। मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले उमरिया के गाँव माली में तेज धूप में सिर पर घड़े रखे बच्ची और महिलाएँ पानी के लिए जद्दोजहद करती हुई दिखाई दे रही है। इस गाँव के 900 परिवारों के बीच मात्र 1 कुँआ है, वह भी 3 किलोमीटर दूर। आदिवासी बच्चे और महिलाएँ और पुरूष रोज 3 किलोमीटर दूर जाते हैं, तब जाकर उन्हें पानी नसीब होता है। बूंद-बूंद पानी उनके जीवन का संघर्ष बन गया है।
अब बात करते हैं, मण्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह नगर उज्जैन की ! उज्जैन में अनेक मोहल्ले ऐसे हैं, जो पीने के पानी के लिए रोज संघर्ष कर रहे हैं। पिछले दिनों से मिल्कीपुरा और ढाबा रोड क्षेत्र के रहवासी पानी को लेकर परेशान हो रहे हैं। इसी प्रकार विक्रम नगर और आसपास के क्षेत्र में भी पानी की किल्लत बनी हुई है। कई बार शिकायत करने पर पानी का टैंकर आता है। इसके लिए भी रोज ही मशक्कत करनी पड़ती है। तब जाकर उन्हें पानी मुहैया हो पाता है। इसी प्रकार नागझिरी क्षेत्र के आदर्श नगर में कई दिनों से गंदे पानी की सप्लाई की शिकायत आ रही है।
उज्जैन के विक्रम नगर क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। यहाँ के 400 परिवार बूँद-बूँद पानी के लिए तरस रहे हैं। टैंकर के आने पर महिला और बच्चे धक्का-मुक्की के बीच पानी भरने के लिए मजबूर है। विक्रम नगर में पीने के पानी के लिए 64 लाख की लागत की पाईप लाईन मंजूर है। उसके बावजूद अभी तक नगर निगम ने काम ही शुरू नहीं किया है।
आज से 7 साल पहले 2019 में विक्रम नगर में 2 करोड़ 17 लाख रूपए की लागत से पानी की टंकी बनाई गई थी। इससे विक्रम नगर, विवि कैम्पस, भर्तृहरि नगर, रेलवे कॉलोनी और 3 नम्बर नाका क्षेत्र में पानी पहुंचाना था। पाईप लाईन भी डाली गई। लेकिन रेलवे लाईन पार करने की अनुमति नहीं मिलने से बीच में ही काम अटक गया। हाल ही में रेलवे से अनुमति मिल गई है, किन्तु पाईप लाईन डालने का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है। इस कारण उक्त मोहल्लों के रहवासी पानी का संकट झेल रहे हैं। इन मोहल्ले में टैंकर आते ही पानी प्राप्त करने के लिए पाईप लेकर टूट पड़ते हैं।
अब हम बात करते हैं, देश के सबसे स्वच्छ नगर इन्दौर की। इन्दौर के पालदा और सुखलिया के लोग पानी नहीं मिलने के कारण उनमें हाहाकार मचा हुआ है। पिछले दिनों इन्दौर-नेमावर रोड पर पानी के लिए धरना प्रदर्शन किया तो पुलिस उन्हें हटाने पहुंच गई। उन्हें तत्काल पानी तो नहीं मिला, किन्तु भँवर कुँआ पुलिस ने बिना अनुमति प्रदर्शन करने और रास्ता बाधित करने के मामले में 18 लोगों पर केस दर्ज जरूर कर लिया !
भारत की आजादी के 79 वें साल हो गए। लेकिन भारत-पाक बॉर्डर के आखिरी गाँव अकली और कैर कोरी में पानी का संकट जस का तस है। यहां के लोग आज भी आजादी से पहले बनी बेरियों ( छोटे कुँए ) पर निर्भर हैं। कई महिलाएं रात में बेरियों पर पहरा देती है, ताकि रिस-रिस कर जमा हुआ पानी भर सके। बॉर्डर के इन इलाकों में 700 किलोमीटर दूर से नर्मदा का पानी घर-घर तक पहुँचाने के दावे तो अनेक हुए। कागजों में टंकियां भी खड़ी कर दी गई। लेकिन हकीकत यह है कि कई घरों तक नल कनेक्शन पहुंच ही नहीं पाए।
राजस्थान के अकली गाँव की आबादी करीब 500 है और 130 से ज्यादा छोटी बस्तियाँ भी है। यहाँ की बेरियां आजादी के पहले की है। पहले यहाँ 150 से ज्यादा बेरियां थी। लेकिन समय पर उसकी खुदाई और मरम्मत नहीं होने से 130 बेरियां रेत से भरकर सूख गई। अब केवल 15-20 बेरियों से ही पानी मिल पाता है। यहां की महिलाओं के लिए रोज बेरियों से पानी प्राप्त करना रोज की जद्दोजहद है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के आदिवासी बहुल सगौर गाँव में सुबह पानी भरने गई तीन बच्चियों की कुँए में डूबने से मौत हो गई। गाँव में नल-जल योजना होने के बावजूद नल सूखे पड़े हैं। इस कारण ग्रामीणजन दूरस्थ स्त्रोतों से पानी लाने के लिए मजबूर है। राधा गोंड (14), तनु गोंड (11) और अमृता गोंड (11) गाँव से करीब एक किलोमीटर दूर कुएं पर से पानी भरने गई थी। पानी भरने के बाद एक बच्ची का पैर फिसल गया, उसे बचाने उतरी दूसरी बच्ची भी गहरे पानी में डूब गई। इन दोनों को बचाने में तीसरी बच्ची भी पानी में डूब गई। इस हादसे से पूरे गाँव में मातम छा गया।
मध्यप्रदेश के गुना शहर से केवल 15 किलोमीटर दूर भीलपुरा मोहल्ले की तस्वीर सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोल रही है। मोहल्ले में करीब 32 साल से बसे लगभग 20 परिवार आज भी स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालात इतने बद्तर हैं कि ग्रामीणजन जमीन खोदकर झिर बनाते हैं और उसी गंदे पानी को कपड़े से छानकर पीने के लिए मजबूर है। यहाँ पर दूषित पानी पीने से बच्चे और बूढ़े लगातार बीमार पड़ रहे हैं। भीलपुरा पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़क नहीं है। गांव में जाने के लिए कच्ची सड़क और बीच में पड़ने वाले नाले को पार करना पड़ता है। बरसात के दिनों में यह रास्ता पूरी तरह से बंद हो जाता है, और ग्रामीणों का सम्पर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाता है। इन आदिवासियों की इस समस्या पर किसी का ध्यान नहीं है।
अब हम बात करते हैं, गुजरात के चैरापूंजी की। गुजरात के बलसाड़ जिले में गुजरात-महाराष्ट्र बॉर्डर पर बसे मोटी पलसाण गाँव के बेरस्ता फलिया में पीने के पानी के लिए लोगों को आज भी जान जोखिम में डालनी पड़ती है। यहाँ करीब 45 फीट गहरे कुएं में सीढ़ी के सहारे उतरकर पानी भरना उनकी मजबूरी है। विडंबना यह है कि इस इलाके को गुजरात का चेरापूंजी कहा जाता है। फिर भी हर गर्मियों में जल संकट खड़ा हो जाता है। सरकार की करोड़ों रूपयों की एस्टोल समूह जल आपूर्ति योजना यहां फेल साबित हो रही है। गाँव में हर घर नल कनेक्शन दे दिए गए हैं। लेकिन नलों में पानी ही नहीं आता है।
आजादी के 8 दशक हो जाने के बावजूद लोगों को पीने का पानी मयस्सर नहीं होना केन्द्र और राज्य सरकार दोनों के लिए शर्मनाक है। पिछले कुछ समय से केन्द्र सरकार ने नल-जल योजना शुरू की थी। यह वाकई अच्छी पहल थी, किन्तु अधिकारियों की लापरवाही से अनेक गाँव ऐसे हैं, जहाँ पाईपलाईन डल गई तो टंकी नहीं बनी। कई गांव में टंकियां बन गई तो पाईप लाईन नहीं डली। कुछ गांव में टंकी और पाईप लाईन दोनों डल गई किन्तु पंचायत और संबंधित विभाग की लापरवाही से इन नलों में पानी ही नहीं आता है। नियमित संधारण नहीं होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश नल-जल योजना की हालत खस्ताहाल है। इस और किसी का ध्यान नहीं है। केन्द्र और राज्य सरकार को चाहिए कि गाँव हो या शहर वहां के लोगों को नियमित रूप से पेयजल प्राप्त हो इसके लिए प्राथमिकता पर समीक्षा करते हुए कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि वहां के निवासियों को पेयजल प्राप्त हो सके।
