राम का चरित्र जितना निर्दोष, सीताजी का चरित्र उतना ही पवित्र – डॉ. सुरेश्वरदास

राम का चरित्र जितना निर्दोष, सीताजी का चरित्र उतना ही पवित्र – डॉ. सुरेश्वरदास

बर्फानी धाम के पीछे गणेश नगर में चल रही रामकथा में आज सीता स्वयंवर प्रसंग – भजनों पर थिरक रहा पांडाल

इंदौर । राम यदि मर्यादा पुरूषोत्तम है तो सीताजी भारतीय नारी का आदर्श प्रतिबिंब। जिस दिन हर घर में राम जैसा बेटा और सीता जैसी बहू हो जाएंगे, रामराज्य स्वतः चला आएगा। राम का चरित्र जितना निर्दोष है, सीताजी का चरित्र उतना ही पवित्र और पावन। नारी का सच्चा आभूषण उसकी लज्जा होती है। धनुष यज्ञ अहंकारी राजाओं के घमंड को तोड़ने का प्रतीक है। मानस की कथा मनुष्य को निर्भयता प्रदान करती है। महापुरूष वही होते हैं, जो स्वयं की समस्या को छोडकर राष्ट्र की समस्याओं के निवारण का चिंतन करते हैं। जीवन में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे राम नाम का चिंतन छूट जाए और हमारे भजन भक्ति बिगड़ जाए।

कथा के दौरान मनोहारी भजनों पर समूचा पांडाल आज भी झूमता रहा ।

डॉ. सुरेश्वरदास ने कहा कि भगवान राम ने मानस के प्रसंगों में माता-पिता और गुरू की आज्ञा मानकर उनकी सेवा जैसे आदर्श प्रस्तुत किए हैं। प्रभु ने रावण को मारने के लिए किसी अस्त्र-शस्त्र का नहीं बल्कि अपने दृढ़ संकल्प का उपयोग किया। जग में कोई भी स्थिर नहीं है, सिवाय राम के। ज्योति स्वरूप केवल राम ही हैं, जिन्हें स्थिर माना गया है। सीताजी का त्याग और समर्पण भारतीय इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। एक आदर्श भारतीय नारी का स्वरूप यदि कहीं देखना हो तो केवल सीता माता में ही मिल सकता है। हमारे कर्म विनाशी हैं, कर्म से मिलने वाले फल भी नाशवान है लेकिन प्रभु राम एवं परमात्मा की सेवा के निमित्त किए गए कर्मों का फल कभी नष्ट नहीं होता। संसार के लुभावने विषय भोग और मोह-माया के मकड़जाल से मुक्ति के लिए अपनी सत्ता का परमात्मा की सत्ता में विलय आवश्यक है। बिना सत्संग और गुरू के परमात्मा की कृपा प्राप्त करना संभव नहीं है।