सरोकार – सप्तसागरों को बचाने आगे आया एनजीटी

डॉ. चन्दर सोनाने
देश में मध्यप्रदेश के केवल उज्जैन में ही सप्तसागर है, जिसका अपना धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है। दिनोंदिन इन सप्त सागरों की दुर्दशा बढ़ती जा रही है। प्रत्येक सागर में लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। इसी प्रकार इन पौराणिक सागरों में गंदा पानी मिलने से जिला प्रशासन और नगर निगम रोक नहीं लगा पा रहा है। ऐसी हालत में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ( एनजीटी ) इन प्रसिद्ध सप्तसागरों पर से अवैध कब्जे हटाने और गंदा पानी मिलने से रोकने आगे आया है।
हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण भोपाल ने उज्जैन के इन सप्तसागरों को बचाने के लिए कड़े निर्देश जारी किए है। एनजीटी ने ये देखा है कि गोवर्धन सागर सहित सभी जलाशयों में अवैध कब्जा हो गया है और गंदा पानी इन सागरों में मिल रहा है। इन सप्तसागरों में से एक सागर तो सागर नहीं रहा बल्कि कुंड सा बन गया है। इसकी दुर्दशा सबसे अधिक है। पुराणों में भी इन सप्तसागरों का महत्व प्रतिपादित किया गया है।
पीठ में न्यायमूर्ति श्री एस.के सिंह और विशेषज्ञ सदस्य श्री सुधीर कुमार चतुर्वेदी थे। एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि 36 बीघा क्षेत्र में से 18.5 बीघा जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है। यानी सागर की आधी जगह में कब्जा हो चुका है। एनजीटी ने यह भी कहा है कि पहले उज्जैन नगर निगम और जिला प्रशासन को जो निर्देश दिए थे, उसका उन्होंने पालन नहीं किया है। इस पर एनजीटी ने सख्त टिप्पणी भी की।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को यह आदेश दिया है कि उज्जैन के इन प्रसिद्ध जलाशयों से अवैध कब्जा हटाया जाए। इसके साथ ही इन सभी सप्तसागरों में मिल रहे गंदे पानी को रोकने की सख्त कार्रवाई की जाए। एनजीटी ने पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सप्त सागरों की मासिक निगरानी करने और जल की गुणवत्ता की भी रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं।
एनजीटी ने 12 साल में एक बार उज्जैन में लगने वाले सिंहस्थ के भव्य आयोजन को देखते हुए इन जलाशयों की पवित्रता और पानी की शुद्धता बनाए रखने का महत्व भी प्रतिपादित किया। उल्लेखनीय है कि पूर्व में भी साधु संतों ने सप्तसागरों की पवित्रता बनाए रखने और अतिक्रमण रोकने के लिए अनेक बार जिला प्रशासन से अनुरोध भी किया था। एक बार तो साधु संतों ने सप्तसागरों की सुरक्षा के लिए धरना आंदोलन भी किया था, किन्तु हुआ कुछ विशेष नहीं ! आज भी सप्तसागर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं।
सप्तसागरों में से एक प्रसिद्ध रूद्रसागर है। यह महाकाल मंदिर से लगा हुआ होने के कारण से भी अपना विशेष महत्व रखता है। किन्तु इस पर भी अवैध अतिक्रमण हो गया। निजी अतिक्रमणकारियों के अलावा शासकीय स्तर पर भी इस पर अतिक्रमण किया गया। वर्ष 2016 के सिंहस्थ के समय सप्तसागर पर ही त्रिवेणी संग्रहालय बना दिया गया। यह संग्रहालय रूद्रसागर के करीब आधे पानी पर ही अतिक्रमण करके बनाया गया। इसके बाद भव्य महाकाल लोक बनाया गया। इस रूद्र सागर के किनारे-किनारे ही महाकाल लोक बनाया गया। महाकाल लोक ने भी रूद्र सागर को छोटा कर दिया। सरकार के ही विभाग मिलकर यदि रूद्रसागर पर अतिक्रमण कर निर्माण करेंगे तो उसे कौन रोकेगा ?
आइये, अब हम देखते हैं इन पौराणिक सप्तसागरों का महत्व क्या है ? अधिक मास का महत्व मानने वाले श्रद्धालु धर्म के मान से धार्मिक यात्रा करते हैं। इसमें सबसे ज्यादा उज्जैन के सप्तसागर, नौ नारायण और चौरासी महादेव की यात्रा फलदायी बताई गई है। सप्त सागर दर्शन के स्थान एवं दान सामग्री की जानकारी इस प्रकार बताई गई है –
रुद्रसागर, यह उज्जैन में माँ हरसिद्धि की पाल पर स्थित है। वहाँ पर नमक, श्वेत वस्त्र, चाँदी के नंदी की मूर्ति का दान का महत्व बताया गया है। पुष्कर सागर, ये नलिया बाखल में स्थित है और इसमें पीला वस्त्र, चना दाल, स्वर्णदान किया जाता है। क्षीरसागर, नई सड़क पर बसा है। यहाँ साबूदाने की खीर और पात्र दान किया जाता है। गोवर्धन सागर, निकास चौराहा पर स्थित है। यहाँ पर माखन, मिश्री, पात्र में गेहूँ और लाल वस्त्र दान करना शुभ माना गया है।
रत्नाकर सागर, ग्राम उंडासा तालाब पर स्थित है। यहाँ पंचरत्न, महिला के श्रृंगार की सभी वस्तुएँ एवं महिला के वस्त्रों का दान किया जाने का विशेष महत्व बताया जाता है। विष्णु सागर, यह अंकपात मार्ग पर श्रीराम-जनार्दन मंदिर के पास (पाल पर) है। यहाँ भगवान विष्णु की मूर्ति, आसन, पंचपात्र, गोमुखी, ग्रंथ, माला, भू देव के पूर्ण वस्त्रदान दान किए जाते हैं। पुरुषोत्तम सागर, यह अंकपात दरवाजा के पास स्थित है, जिसे सोलह सागर भी कहते हैं। यहाँ चलनी, मालपुआ का दान करने की परंपरा है।
मध्यप्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव उज्जैन के ही है। और उज्जैन दक्षिण क्षेत्र से विधानसभा के सदस्य है। वे सप्तसागरों का महत्व अच्छी तरह से समझते हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे अब सप्तसागरों पर भी ध्यान केन्द्रित करें। वे सबसे पहले सप्तसागरों से अतिक्रमण हटाने का अभियान शुरू कर प्रत्येक सप्तसागरों के आसपास बाउंड्रीवाल बनवाए, ताकि भविष्य में कोई अतिक्रमण न हो सके। इसके साथ ही इन सागरों में मिल रहे गंदे पानी को रोकने का स्थायी बंदोबस्त किया जाए, ताकि इसकी शुद्धता और पवित्रता बनाई रखी जा सके। ऐसा होगा तो ही सप्तसागरों को बचाया जा सकेगा अन्यथा दिनोंदिन इन सप्तसागरों पर अतिक्रमण बढ़ता ही जायेगा और एक दिन ऐसा आयेगा कि वे लुप्त हो जायेंगे !