

रतलाम 5 सितंबर । पर्यूषण पर्व के अंतर्गत श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
दो बत्ती स्थित लोकेंद्र भवन पर पर मुनि श्री सद्भाव सागर जी मसा.ने अपने व्याख्यान में कहा कि उत्तम आकिंचन्य रत्नत्रय व्रत के बारे में बताया कि उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य,उत्तम संयम,उत्तम तप उत्तम त्याग यह आठो धर्म के सार है परंतु अब कुछ विशेष प्रारंभ होने वाला है यह आठ बाहर दिखेंगे जब भी व्यक्ति आपके पास, अपने लिए आपसे जुड़ेगा वह अकिंचन धर्म है। जिस दिन अकिंचन भाव पर दृष्टि चली जाएगी आपको आंतरिक समृद्धि का भंडार मिल जाएगा।
। अकिंचन स्वरूपोअहम्। मैं अकेला हूं,अकेला था और अकेला ही जाऊंगा।यह जीव जब समझता है तो वह जुड़ता है,जोड़ता है और टूटता है। सबसे पहले जीव संसार से परिवार से लोगों से जुड़ता है और व्यावहारिकता, कार्य, व्यापार नौकरी में लोगों को जोड़ता है और अंत में टूटता है क्योंकि अंत में व्यक्ति समझ जाता है की संसार में सभी लोग स्वार्थी हैं तो वह टूटता है। टूटना भी दो प्रकार का होता है। जीव जब दूसरे जीव के मोह में पड़ जाता है और उसे धोखा मिलता है तो वह टूटा है और डिप्रेशन में चला जाता है और दूसरा गुरु से गुरु से जुड़ता है तो संसार से टूटता है और गुरु समझते हैं की जीव जुड़ता है तो उसे गुरु रोकते हैं जीव नहीं मानता है और मोह और राग में आकर लोगों को जोड़ता है फिर भी गुरु समझते हैं और अंत में संसार से टूटता है और पूर्ण रूप से गुरु से जुड़ जाता है क्योंकि जीव जब तक टूटेगा नहीं वह जुड़ भी नहीं पाएगा इसलिए एकात्म भाव भाव गुरु समझते हैं और जब एकात्मक भाव एकोभव का रस आने लग गया तब समझ लेना की अकिंचन भाव आ गया है क्योंकि जब अकिंचन भाव आएगा तो आप अपने घर नहीं रह पाओगे इसलिए अज्ञानी जीव रोता है और बैरागी खुश हो जाता है क्योंकि जीव वस्तु स्वरूप को समझ लेता है यह सृष्टि का नियम है। अकिंचन के सिद्धांत को आप बचपन से सुनते गुनगुनाते आए हो पर यह भाव से भिन्न स्व भाव को मनाना यही अकिंचन है। तुम जिस मित्र के साथ हो उससे मिलकर रहो पर उसे अपना मत मान लेना क्योंकि मित्र, परिवार, रिश्ते यह सब यही रह जाएंगे और मोक्ष मार्ग में साधना करने के समय अगर ध्यान भटक गया तो मोक्ष प्राप्ति में सहायक की जगह बाधक हो जाएंगे। क्योंकि व्यवहार मिटाए बिना संसार मिट्टी नहीं सकता क्योंकि आप दूसरों के साथ तो रहे पर अपने साथ नहीं रहे अपने साथ रहना सीख लो भगवान महावीर स्वामी के 96000 रानियां थी किसी भी चीज की कमी नहीं थी तब तक उनको अकिंचन भाव नहीं आया। जैसे ही उन्होंने छोड़ा अकिंचन भाव जागृत हो गया एकोऽहम् दीक्षा लेने की भावना है तो बहुत ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है। मिलकर रहो, व्यवहार आपका धर्म है नहीं रहना भी पाप है, नहीं मिलोगे तो तुम किसी और से मिल जाओगे। अकिंचन धर्म में प्रवेश करना है तो यही शिक्षा देता है कि मिलकर रहो, मिले मत रहना। उक्त बात अपने प्रवचन में कहीं। कल प्रातः 8:30 बजे उत्तम ब्रह्मचर्य अनंत चतुर्दशी पर व्याख्यान दिया जाएगा।
इस शिविर के निर्देश प्रतिष्ठा आचार्य श्री संतोष भैया जी ललितपुर है तथा संगीतकार हार्दिक जैन मुंबई द्वारा भजन किए जा रहे हैं। आयोजक श्री चंद्र प्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ, श्री विद्या सिंधु महिला मंडल श्री विमल सन्मति युवा मंच एवं सकल दिगंबर जैन समाज रतलाम है। उक्त जानकारी श्रावक संघ संयोजक श्री मांगीलाल जैन ने दी।



