राम मंदिर चोरी का राजनीतिकरण अनुचित – प्रो.देवेन्द्र कुमार शर्मा

कैसे हुआ यह भी विचार करने का विषय है। कोषाध्यक्ष कभी कोष की तरफ ध्यान नहीं देते थे। केवल यह कहने से कि कोष के मामलों से उनका कोई संबंध नहीं रहा अपनी जवाबदारी से मुक्त नही हो सकते। अपने कर्त्तव्य का पालन न करना भी ट्रस्ट (विश्वास) का निर्वाह न करना ही होता है। ट्रस्ट के नियमानुसार सरकारी अधिकारियों को जांच करने का अधिकार होता है, उन्होंने भी ट्रस्ट में क्या चल रहा है इस पर ध्यान नहीं दिया। शायद सभी यह मानकर चल रहे थे कि कोई प्रभु राम के प्रति अपनी आस्था को धोखा नहीं दे सकता। वे यह भूल गए कि बेईमान का कोई धर्म नहीं होता। सरकार को चाहिए कि ट्रस्ट में बहुत ईमानदार और सख्त अधिकारी की प्रशासक के रूप में नियुक्ति की जाए। जिन्होंने अपने कर्त्तव्य का निर्वाह उचित ढंग से नहीं किया उनके विरूद्ध भी कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल यह कह देने से मेरा चोरी से कोई लेना-देना नहीं कोई अपने उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। जिन्होंने चोरी की उन्होंने राम भक्तों की आस्था को गहन आघात पहुंचाया है और जिन्होंने ध्यान नहीं दिया उन्होंने भी गंभीर अपराध किया है। फिर भी भगवान राम में हमारी आस्था अडिग है। चोरी के राजनीतिकरण का प्रयास सफल होने वाला नहीं।