रतलाम 21 फरवरी । शा.कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान पंरपरा की भूमिका पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस 21 फरवरी को कार्यक्रम के शुभारंभ के पश्चात अतिथि वक्ताओं का स्वागत डॉ. मीना सिसौदिया, डॉ. संध्या सक्सेना, डॉ. स्वर्णलता नागर द्वारा किया गया। तत्पश्चात पधारे अतिथियों का अतिथि परिचय प्रो सौरभ गुर्जर ने दिया।
संगोष्ठी में प्रथम वक्ता के रूप में डॉ कल्पना सिंह ने वैश्वीकरण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका पर बोलते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा बहुत सारे तथ्यों को साथ लेकर चलती है, बहुत सारे लक्ष्यों को पूर्ण करने के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा हमारे लिए उपयोगी सिद्ध होगी।
संगोष्ठी को आगे बढाते हुए मध्य में तकनीकी सत्र रखा गया जिसमें अपराजिता, श्वेता यादव, रक्षा यादव, आदर्श , याशी पांचाल, बंकट नागर, अक्षत पंडित, सुनीता जैन आदि में शोध पत्र सारांश का वाचन किया। सत्र के समानांतर ऑनलाइन सत्र भी आयोजित हुआ जिसमें डॉ शीतल श्रीमाल, डॉ संजय गार्डगे, लता धुपकरिया, डॉ मीनू डिडवानी, संगीता चौहान, डॉ. प्रियांशु गुप्ता, डॉ श्वेता चौहान, प्रो रुपाली आदि ने अपने शोध पत्र का वाचन किया।
द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ. प्रदन्या करन्दीकर ने अपने वक्तव्य में बताया कि योग व आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति आज के समय मे कितनी आवश्यक है, आज की जीवनशैली तनावपूर्ण हो गई है जिसे योग के माध्यम से खत्म किया जा सकता है, योग एवं आयुर्वेद का चिकित्सकीय महत्व, पध्दति, तनाव व जीवनशैली, रोगों में वृद्धि बदलती जीवनचर्या में आयुर्वेदिक पद्धति को भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया।
संगोष्ठी के अगले चरण में अतिथि परिचय डॉ बी वर्षा ने दिया। सत्र की अगली वक्ता डॉ. मुनीरा हुसैन रहीं जिनका विषय आधुनिक आहार में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका’ पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि हमें अपने आहार में ज्ञान परंपरा को लेकर चलना होगा यह तय करना होगा कि इस ज्ञान में कितना परिवर्तन करना है जिससे हम इसे वर्तमान संदर्भ में व्यवस्थित रूप से अपना सकें, पारम्परिक आहार को विज्ञान ने बहुत बाद में पहचाना हमारी परंपरा में यह पहले से निहित है। पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक तरीके से समझेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।
डॉ विनोद शर्मा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हम पीछे क्यों रहे हैं, जब तक हम भारतीय ज्ञान परंपरा को पाश्चात्य दृष्टि से नहीं देखेंगे, तब तक हमारी अवधारणा को समझ नहीं पाएंगे। बदलते परिदृश्य में बदलती दृष्टि चाहिए, तभी हम वैश्वीकरण के दौर में आगे जा पाएंगे।
संगोष्ठी का अंतिम समापन सत्र में रहा । महापौर प्रहलाद पटेल, डॉ. राकेश माथुर प्राचार्य वाणीज्य महाविद्यालय के आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। इस दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय के संगोष्ठी के समापन अवसर पर संगीत विभाग की छात्राओं द्वारा वंदे मातरम का प्रस्तुति दी गई, ततपश्चात अतिथियों व महापौर श्री प्रहलाद पटेल, डॉ. राकेश माथुर का स्वागत डॉ मंगलेश्वरी जोशी, डॉ सुरेश चौहान, डॉ तबस्सुम पटेल, डॉ.वी एस बामनिया, डॉ सुनीता श्रीमाल, डॉ स्नेहा पंडित, डॉ संध्या सक्सेना, डॉ मीना सिसौदिया, डॉ सरोज खरे, प्रो नीलोफर खामोशी, प्रो रविराज विश्वकर्मा, श्री निशांक जोशी, डॉ दिवाकर भटेले, डॉ प्रदीप खरे, डॉ अनामिका सारस्वत, डॉ बी वर्षा, श्री शिवप्रकाश पुरोहित, श्री गोपाल पांचाल, डॉ. मनोहर जैन, प्रो सौरभ गुर्जर, डॉ. अनिल जैन ने किया । डॉ सुरेश चौहान द्वारा अतिथि परिचय दिया गया व संगोष्ठी समन्वयक डॉ माणिक डांगे ने दो दिवसीय संगोष्ठी की रिपोर्ट का वाचन किया गया। संगोष्ठी में अपराजिता साठे द्वारा विस्तृत फीडबैक देते हुए बताया कि इस संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे विस्तृत विषय को लेकर के आप सभी के समक्ष प्रस्तुत किया।
महापौर प्रहलाद पटेल ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन के विभिन्न संस्मरण को सुनाते हुए गीता के कर्म योग का महत्व जीवन के हर क्षेत्र में बताया तथा पर्यावरण संरक्षण की महत्वपूर्ण भारतीय ज्ञान प्रणाली को अपना कर नगर को स्वच्छ व सुंदर बनाने की अपील की उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण हमारी प्रमुख जिम्मेदारी है, जिसे प्रत्येक नागरिक को अपनाना चाहिए गीता को प्रत्येक कक्षा के प्रत्येक पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर अनवरत तरीके से अपनाना चाहिए क्योंकि जो गीता के मर्म को समझ सकेंगे वहीं देश धर्म तथा माता-पिता का एवं परिवार का ध्यान रख सकते हैं पद तो चलायमान है किंतु कर्म से ही मनुष्य श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है हमें निर्भीकता से सत्य का साथ देना चाहिए।
कार्यक्रम को डॉ. राकेश माथुर ने भी संबोधित किया । महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ मंगलेश्वरी जोशी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति बताया यहां का आध्यात्मिक ज्ञान ही यहां की विशेषता है जिसे अपना कर हम गौरवान्वित होते हैं। कार्यक्रम में अतिथियों व आयोजको को स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नाम अनामिका सारस्वत ने किया व आभार डॉ. तबस्सुम पटेल ने माना।



