रतलाम । आचार्यश्री उमेशमुनिजी म.सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तकश्री जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. आदि ठाणा-9 व पुण्यपुंज साध्वी श्री पुण्यशीलाजी म.सा. आदि ठाणा-10 के सानिध्य में डी.पी. परिसर पर बुधवार से पर्युषण महापर्व की आराधना प्रारंभ हुई। प्रथम दिन ही श्रद्धालुओं का जर्बदस्त सैलाब उमड़ा। प्रवर्तकश्री की सानिध्य में पर्व की आराधना करने हेतु मध्यप्रदेश सहित विभिन्न प्रांतों के श्रावक-श्राविकाएं भी बड़ी संख्या में रतलाम पहुंचे है। पर्व के प्रथम दिन आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तकश्री जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. ने कहा कि पर्व दो प्रकार के होते है-लौकिक और लोकोत्तर। लौकिक पर्व में खाना-पीना, नाच-गान होता है। जबकि लोकोत्तर पर्व में त्याग की प्रधानता रहती है। इस पर्व की आराधना चतुर्विद् संघ करते है। पर्युषण पर्व लोकोत्तर पर्व है। इस महापर्व को तप-त्याग के साथ मनाते है। तप-त्याग से क्यों जोडऩा..? इस पर आपने कहा कि यह जीव अनादि से ब्राह्य से जुड़ा है। तप त्याग से हमें ब्राह्य वृति छोड़ आत्म वृति से जुडऩा है। यह पर्व स्वयं के दोषों को देखने का मौका है। प्रवर्तकश्रीजी ने कहा कि क्रोध, मान, माया, लोभ ये आत्मा के विकारी भाव है। इन कषायों पर विजय पाने से पहले इनकी जानकारी होना चाहिए। जानेंगे तो ही इन पर विजय प्राप्त कर सकेंगे। ये विकारी भाव आत्मा को हरा रहे है। हमारे आत्म गुणों को नष्ट कर रहे है। इसलिए इन पर विजय प्राप्त करना है। दोषों को जानना जरूरी है। ये आठ दिन दोषों को दूर करने की तैयारी रूप है। इसलिए आत्म दोषों को समझना तथा समझकर छोडऩा है। *श्रद्धा की आराधना आठ दिनों तक जीवन भर चलेगी-अतिशयमुनिजी* धर्मसभा में अतिशयमुनिजी म.सा. ने कहा कि तीर्थंकर भगवान भी इस पर्व का इंतजार करते है, इसे उत्साहपूर्वक मनाते है। वह पर्व हमारे सामने उपस्थित है। संवत्सरी महापर्व किसलिए आता है? पर आपने कहा कि यह पर्व अपने दुर्गुणों को निकालने और सद्गुणों को प्रकट करने के लिए आता हैलेकिन यह कार्य एक दिन में नहीं हो सकता है। इसलिए पूर्वाचार्यों ने सात दिन मिलाकर आठ दिनों का पर्युषण पर्व मनाया। कुल मिलाकर भादवा सुदी पंचमी क्षमापर्व के रूप में मनाना है। वास्तविक धर्म की पहचान क्या..? आप धर्म किसमें मानते हो? इस पर आपने विस्तार से समझाते हुए कहा कि कोई चमत्कार में, कोई लब्धि में, कोई आरम्भ में तो कोई हिंसा में धर्म मानते है। कोई कहता चारधाम की यात्रा में तो कोई कहता पहाड़ों की यात्रा में धर्म है। एकाभवतारी बनते है वहीं है क्या.. ऐसा होता तो पंचमहाव्रतधारी संसार छोड़ते क्या…आराधना करते क्यों…पहाड़ों की यात्रा से ही एकाभवतारी बन जाते। वास्तविक धर्म कौन सा.. अन्यमतियों ने आचार्य भगवंत से पूछा कौन सा धर्म श्रेष्ठ…? जवाब में गुरुदेव ने जैन धर्म श्रेष्ठ ऐसा नहीं कहा। गुरुदेव ने पूछा- बोलो हिंसा में धर्म है..? नहीं…! झूठ बोलने में धर्म हैै..? नहीं…! चोरी करने में धर्म है… नहीं, अब्रह्म में धर्म है..? नहीं…! परिग्रह में धर्म है..? नहीं…! गुरुदेव ने कहा कि जो धर्म इन पांचों बातों का निषेध करता है वहीं धर्म श्रेष्ठ है। संपूर्ण पापों के त्याग में, संवर में ही धर्म है। सबका रास्ता अलग-अलग परंतु मार्ग एक यह बात सही नहीं है। सबका रास्ता एक है मार्ग भी एक और मंजिल भी एक है कि- संपूर्ण पापों का त्याग। मोक्ष का शोर्टकर्ट क्या..? इस पर आपने कहा कि संयम के अलावा कोई शॉर्टकट होता तो संयम क्यों लेते। जो धर्म संपूर्ण पाप के त्याग की बात करता है, वह धर्म श्रेष्ठ है। हमें कहीं उलझना नहीं है। आठ दिनों में जोर देना है श्रद्धा पर। श्रद्धा बराबर होगी तो वह आराधना आठ दिन नहीं जीवन भर चलेगी। अपने अंदर त्याग भावना बढ़े, भोग भावना घटे, इस मार्ग पर आगे बढ़े ज्ञान, दर्शन, चारित्र तप को पुष्ट करें। *पर्युषण पर्व में विशिष्ट आराधना करें-साध्वी पुण्यशीलाजी म.सा.* पुण्यपुंज साध्वी पुण्यशीलाजी म.सा. ने कहा कि कई दिनों से जिसका हम इंतजार कर रहे थे, वे पावन पवित्र दिन पर्युषण महापर्व आ गए है। अंतगढ़ सूत्र के माध्यम से उन महापुरुषों का सुंदर चरित्र श्रवण कर रहे है। वास्तव में कैसा उनका जीवन था, भगवान की एक वाणी सुनी और संसारी सुखों को त्याग कर भगवान के मार्ग पर चल पड़े। रास्ता मिला और सिद्ध-बुद्ध और मुक्त हो गए। आपने कहा कि चिंतन करना कि क्या उन्हें घर में सुख नहीं मिल रहा था..? संसार का सुख असली की नकली..?- नकली। आप को संसार की हर वस्तु असली चाहिए तो फिर यह नकली सुख कैसे पसंद आ रहा है। हम अनंतकाल से इस नकली सुख को ही ग्रहण कर रहे है। एक बार असली सुख का प्रयास कर लिया तो वह हमेशा रहने वाला है। असली सुख कभी दुख में परिवर्तित नहीं होता है। हमें असली सुख का प्रयास करना है।
इस पर्व में ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप की विशिष्ट आराधना करना है। ज्ञान से जीव जानता है, दर्शन से श्रद्धा होती है, चारित्र से कर्म रुकते है तथा तप से पुराने कर्म क्षय होते है। यह दुनिया हमें ठग रही है। हमें असली सुख का प्रयास करना है। साध्वी अनंतगुणाजी व प्रणिधिजी ने स्तवन प्रस्तुत किया। अंतगढ़ सूत्र का वाचन रत्नपुरी गौरव सुहासमुनिजी म.सा. ने किया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने पौषध, संवर, उपवास आदि विविध तप आराधना की। संचालन अणु मित्र मंडल के मार्गदर्शक राजेश कोठारी ने किया। प्रभावना का लाभ श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ ने लिया। यहां पर बड़ी संख्या में आराधक तपस्या कर रहे है।


