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वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गीता दुबे की पुस्तक का विमोचन
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नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों ने किया सम्मान


रतलाम। देश के प्रख्यात साहित्यकारों ने बहुत से विषयों पर बहुत सा साहित्य लिखा है पुस्तकें लिखि हे लेकिन स्त्री अस्तित्व और उनके स्वाभिमान पर लिखना बहुत चुनौती भरा कार्य है। नारी शक्ति को वैचारिक आवरण की आवश्यकता है, अधिकारों और सम्मान की बात बहुत होती है, लेकिन वैचारिक आजादी के लिए बहुत कम लोग बोलते हैं लिखते हैं। डॉ गीता दुबे ने अद्भुत साहस दिखाया है अपनी पुस्तक के माध्यम से उन्होंने महिलाओं की वर्तमान पीड़ा और अंतर्द्वंद्व को परिभाषित करते हुए खुलकर जीने की और अपने आप को स्थापित करने का जय घोष किया है, देहभर का प्रकाशन साहित्य जगत और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं जो आने वाले वर्षों तक अपनी उपयोगिता सिद्ध करेगा।
उपरोक्त विचार शिक्षक सांस्कृतिक संगठन द्वारा प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ गीता दुबे लिखित पुस्तक देहभर के विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध चिंतक साहित्यकार शिक्षाविद डॉक्टर मुरलीधर चांदनी वाला ने व्यक्त किये।
आपने पुस्तक में प्रकाशित कविताओं पर अपनी समीक्षा करते हुए कहा कि जब हमारी मां, बहन या बेटी कोई कविता रचती है तो समस्त स्त्रीशक्ति उसके इर्द-गिर्द होती है जो उसकी कलम की नींभ पर सवार होकर परिवर्तन का उद्घोष करती है। यह कविताएं स्त्री के भीतर तक प्रवेश कर जाती है, स्त्री कोमल भावनाएं और संवेदना की प्रतिमूर्ति होती है इसके बावजूद काली और दुर्गा की तरह आक्रामक होकर दूषटता का विनाश करते हुए समाज में फैले हुए कचरे को साफ कर देती है। हमारे समय की कवित्री डॉ. गीता दुबे की लिखित कविताओं को पढ़कर मेरे मन में यह भाव उत्पन्न हुए हैं। पुस्तक मैं वर्णित कविताएं नारी अस्तित्व और अधिकारों की व्याख्या करती है पुस्तक में प्रकाशित कुल 60 कविताएं हैं जो नारी के विभिन्न रूपों को प्रतिपादित करती है प्रत्येक कविता स्त्री पात्रों के मर्यादित जीवन पर समाज के नियंत्रण और उनकी पाबंदियों का चित्रण करती हुई प्रकट होती है।
इस अवसर पर पुस्तक लेखिका एवं साहित्यकार डॉक्टर गीता दुबे ने कहा कि मैंने अपने जीवन के अनुभव से बहुत कुछ सीखा है मैं कोई साहित्यकार नहीं हूं लेकिन विचारों की श्रृंखला जब शब्दों का आवरण लेती है तो अपने आप कोई रचना कोई कविता या कोई पद्य बन जाता है हमारे विचार हमारे कल्पनाएं हमारा स्वाध्याय समाज में परिवर्तन के लिए होना चाहिए बदलाव के लिए होना चाहिए स्त्री के प्रति आज भी कई धारणाएं यथावत है। वह आज भी अपने सम्मान के लिए संघर्षरत है बेटी बहन स्त्री मां रिश्तो की चार दिवारी में बंधी हुई है जब भी कदम बाहर निकलने का साहस करती है पाखंड की दीवारें उसका रास्ता रोक लेती है राक्षसी प्रवृत्तियां पल प्रतिपल उसकी राह में कांटे चुभोकर उसे कमजोर होने का एहसास कराती पुस्तक देहभर इस पीड़ा और अंतर्द्वंद्व का सृजन है। आरंभ में मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों ने किया संस्था।
अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने कहां की यह हमारा सौभाग्य हे की नगर को उच्चतम स्तर के साहित्यकारों का साहित्य पढ़ने को मिल रहा है। स्व. अजहर हाशमी, डॉ जय कुमार जलज, जी के बाद डॉ गीता दुबे ने नगर की साहित्यिक सृजनात्मक परंपरा को आगे बढ़ाया है। देहभर नगर की साहित्यिक कृतियों में मिल का पत्थर साबित होगी। इस अवसर पर संस्था द्वारा नगर के प्रमुख साहित्यकारों की उपस्थिति में डॉ गीता दुबे को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
समारोह में प्रसिद्ध चिंतक साहित्यकार प्रोफेसर रतन चौहान, डॉक्टर खुशहाल सिंह पुरोहित, डॉक्टर प्रदीप सिंह राव, डॉ सुलोचना शर्मा, प्रवीणा दवेसर, ओ.पी. मिश्रा, सुभाष कुमावत, जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष रणजीत सिंह राठौड़, रंग कमी युसूफ जवेदी, युवा साहित्यकार आशीष दशोत्तर, श्याम सुंदर भाटी, झाबुआ से पधारे साहित्यिकार शरद चंद्र शास्त्री, जयेंद्र बैरागी, एम. एल. फुलपगारे, कुलदीप पवार, बी एस कटारा, बलवीर सिंह डामोर, प्रकाश हेमावत, कीर्ति शर्मा, तेजपाल सिंह राणावत, नरेंद्र सिंह चौहान, कमल सिंह सोलंकी, नरेंद्र जोशी, शैलेंद्र तिवारी, दिलीप वर्मा, डॉ मुनीद्र दुबे, नरेंद्र सिंह राठौर, कृष्ण चंद्र ठाकुर गोपाल जोशी, भारती उपाध्याय, वीणा छाजेड, रमेश उपाध्याय, मदन लाल मेहरा, दशरथ जोशी, अनिल जोशी आदि उपस्थित थे।



