जितना हम छोडना चाहते है उतनी ही इच्छा बढ़ती है – डॉ संयमलता मसा
रतलाम 12 अगस्त। मालव केसरी श्री सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी मसा के आज्ञानुवर्तिनी पंडित रत्न मालव भूषण श्री महेन्द्र मुनि जी मसा के देवलोक गमन पर श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक द्वारा गुणानुवाद सभा का आयोजन रखा गया, जिसमें महासाध्वी डॉ संयमलता जी मसा ने 04 लोगस्स का काउसग्ग करवाया, संघरत्न इंदरमल जैन, महेंद्र बोथरा, अजय खमेसरा एवं विनोद बाफना ने भी म.सा. के प्रति आदरांजली अर्पित की, ततपश्चात मसा ने माँगलिक फरमाइ।
इस अवसर पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए महासाध्वी डॉ संयमलताजी मसा ने परिग्रह के बारे में बताया की जितना हम छोडना चाहते है उतनी ही इच्छा बढ़ती जाती है। परिग्रह भी 02 प्रकार के होते है। सचित परिग्रह और, अचित परिग्रह, सचित परिग्रह में दास-दासी, नौकर-चाकर, पशु-पक्षी आदि का परिग्रह होता है और अचित परिग्रह में धन-दौलत, जमीन-भवन, सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात आदि का परिग्रह होता है। इच्छा का ना कोई ओर है न कोई छोर है। उपासंगदासांग सूत्र में 10 श्रावको का वर्णन आता है, जिन्होंने अपने परिग्रह का त्याग किया । जब इच्छाओ का अतिक्रमण बढ़ जाता है तब युद्ध होते है, भाई-भाई मे जमीन जायदाद के झगडे कोर्ट में चले जाते हैं।
डॉ कमालप्रज्ञा मसा ने सुख विपाक सुत्र के अंतर्गत सुबाहु कुमार के चारित्र पर उदबोधन दिया साथ ही मसा ने 04 जादुई शब्द पहला कुछ दूसरा कुछ कुछ तीसरा बहुत कुछ और चौथा सब कुछ के बारे में बताया की ये केवल 04 शब्द नही चार धाम की यात्रा का सार है। कुछ लोगो ने कुछ कुछ पाया है, कुछ लोगो ने कुछ कुछ पाया है, कुछ लोगो ने बहुत कुछ पाया है, लेकिन पूरे ब्रहमांड मे ऐसा कोई व्यक्ति नही मिलेगा जिसने सब कुछ पा लिया हो । सोने में बहुत कुछ है सोना बहुमूल्य है, सोने में आकर्षण है, सोने में चमक है, लेकिन सोने में सुगंध नहीं है।


