मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी म.सा. के गुणों को मन में लाकर उस पर चलेंगे तो निश्चित मोक्ष का मार्ग अग्रसर होगा – प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा.

मालव केसरी पूज्य श्री सौभाग्यमलजी म. सा . की 41 वीं पुण्यतिथि जप-तप से मनाई गई

रतलाम। मालव केसरी, प्रसिद्ध वक्ता, महाराष्ट्र विभूषण पूज्य गुरुदेव श्री सौभाग्यमलजी म. सा. की 41 वीं पुण्यतिथि श्री धर्मदास जैन श्री संघ द्वारा शनिवार को जप-तप, त्याग तपस्या के साथ वर्षावास स्थल डीपी परिसर लक्कड़पीठा पर आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. व मुनिमंडल एवं पुण्य पुंज साध्वी श्री पुण्यशीलाजी म. सा. तथा साध्वी मंडल के सानिध्य में उत्साहपूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर श्रावक- श्राविकाओ द्वारा सामूहिक बेले (दो उपवास) तप की आराधना की गई। इस अवसर पर गुणानुवाद सभा का आयोजन भी हुआ। इसके पूर्व डीपी परिसर पर नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप व श्री सौभाग्य चालीसा का पाठ हुआ।
वहीं डीपी परिसर में शनिवार को आयोजित गुणानुवाद सभा में प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि जो सौभाग्यशाली होता है और सही दिशा में पुरुषार्थ करता है, उसका सौभाग्य बढ़ता है। ऐसे ही मालव केसरी पूज्य श्री सौभाग्यमलजी म. सा. थे, जिनकी आज पुण्यतिथि है। उनके पुण्य का उदय हुआ और वह संयम के मार्ग पर आगे बढ़ गए। बचपन में उन्हें पहले माता फिर पिता का वियोग हो गया था। जब वह पूज्य श्री नंदलाल जी म.सा एवं श्री किशनलालजी म.सा. के संपर्क में आए और दीक्षा ली। गुरु का ज्ञान मिला गुरुवर निरंतर आगे बढ़ते गए। संघ की एकता के लिए उन्होंने बहुत प्रयास किया। मालव केसरी म.सा. के हम पर बहुत उपकार हैं। वे अनेक गुणों से संपन्न थे। आज उनकी पुण्यतिथि है। उनके गुणों को मन में लाकर उस पर चलेंगे तो निश्चित मोक्ष का मार्ग अग्रसर होगा।
श्री अतिशयमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि जन्म के के समय यदि कोई पाप कर्मों का उदय हो फिर भी जीव को महापुरुषों के वचन सुनना चाहिए। अशुभ घटना भी भविष्य के लिए शुभ हो सकती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पूज्य मालव केसरीजी म.सा. हैं। अशुभ कर्म का उदय उनके लिए शुभ हुआ। अशुभ कर्म के उदय में उन्हें गुरु मिले और सौभाग्य मिला। इसलिए विपरीत परिस्थिति में भी कभी विचलित नहीं होना चाहिए, हो सकता है उससे कभी कुछ अच्छा हो जाए। शुभ कर्म के उदय में कभी गलत काम न करें। कर्मों की स्थिति विचित्र है। कभी शुभ कर्म का उदय हो और कुछ समय बाद अशुभ कर्म का उदय हो जाता है। छोटी सी उम्र में उन्होंने संयम लेने के बाद पुरुषार्थ किया और उसे समझ लिया, इसके बाद वह सबके गुरु बन गए। गुरुदेव एक प्रकार से जौहरी भी थे। उनका दिन का समय श्रावक के लिए होता था और रात का स्वाध्याय के लिए। वह आगमो के प्रेमी थे। हमने गुरूदेव को देखा नहीं है, उनके बारे में सुना है, उनका अनुसरण करें।
रत्नपुरी गौरव श्री श्रेयांशमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि धर्म की शुरुआत कैसे होती है इस मार्ग पर चलना कैसे है। मोक्ष में जाना है तो सबसे पहले श्रद्धा जरूरी है। इस मार्ग पर चलकर मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। श्रद्धा अनेक प्रकार की हो सकती है, जो गुरु की आज्ञा है वही तीर्थंकर की आज्ञा है। भगवान की आज्ञा पर जो चले हैं, उन्होंने मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया है। जिन्होंने भगवान की वाणी का आचरण किया वह सब सुखी है। श्री सौभाग्यमल म.सा. ने आराधना की, जिनवाणी पर श्रद्धा की। मालव केसरी म.सा. को बचपन में जिनवाणी मिल गई। 10 वर्ष के बच्चे ने संयम लिया और पुरुषार्थ किया और वह वाणी के जादूगर बन गए।
साध्वी श्री महकश्रीजी ने फरमाया कि एक छाता है उसमें 16 ताड़ी है, उसमें लगाने का कपड़ा है लेकिन बीच का डंडा नहीं है तो छाता कैसे बनेगा। ऐसा ही जीवन गुरुदेव का था, माता-पिता के जाने के बाद वह सौभाग्य बने। जिन्हें लोग अनाथ कहते थे, वह सबके गुरु बन गए। अनेक आत्माओं उत्थान के दाता बन गए। जैसे शिल्पी पत्थर से मूर्ति बना देते हैं, वैसे गुरु भी हैं। उन्होंने बचपन में संयम जीवन अपनाया और गुरु के हाथ में जाकर इतने बड़े बन गए। जिन्हें कोई जानता नहीं, पहचानता नहीं, वहां वह सौभाग्य बनकर पहुंच गए और गुरु के प्रति समर्पित होकर आज इतने बड़े बन गए।
चातुर्मास समिति के मुख्य संयोजक धर्मदास गणपरिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शांतिलाल भंडारी व श्री धर्मदास जैन श्री संघ के प्रचार सचिव ललित कोठारी ने बताया कि 1 0 उपवास के तपस्वी धर्मदास जैन श्री संघ के अध्यक्ष रजनीकांत झामर ने संघ की ओर से मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी म.सा. को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रभावना श्री धर्मदास जैन श्री संघ की ओर से वितरित की गई। संचालन अणु मित्र मंडल के पूर्व सचिव सौरभ कोठारी ने किया।