रतलाम । श्रावक होना मजबूरी है। प्रमाद ने घेर रखा है। इच्छाओं को नियंत्रित करना बहुत कठिन कार्य है। श्रावक बनकर श्रेष्ठ कार्य करना भी अत्यंत मुश्किल है। जिनवाणी के माध्यम से साधु और श्रावक के भेद को समझना है। जिसमें जिनवाणी उतर जाती है वह समृद्ध हो जाता है। इच्छा मात्र से लोभ कषाय को निकालने का प्रयास शुरू कर देता है।
उक्त उद्गार धर्मदास गणनायक प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती पूज्य श्री अतिशयमुनिजी म.सा. ने धर्मदास जैन मित्र मंडल नौलाईपुरा स्थानक पर व्याख्यान में फरमाए। उन्होंने फरमाया कि संसार की बात सुनकर हमारी नींद उड़ जाती है लेकिन धर्म के क्षेत्र में रुचि न होकर नींद आना यह बहुत खराब है। यदि आपको कोई चीज समझ नहीं आए तो निरंतर समझने का प्रयास करें। ऐसा नहीं करने से बहुत नुकसान है। जिन क्रियाओं से संसार बढ़े वह करने योग्य नहीं है। संसार की प्रवृत्ति जीव को डुबाने वाली है। मानव भव में हम इससे चेत सकते हैं, इससे बाहर निकलने का प्रयास करें। मोह कर्म स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारने, खुद के घर में आग लगाने जैसा है। प्रमाद का भाव पूर्वक प्रतिक्रमण करने से शुद्धि का लाभ होता है। इसके माध्यम से व्यक्ति स्वयं की शुद्धि का मार्ग अपना सकता है। प्रतिक्रमण साधु और श्रावक दोनों के लिए करना आवश्यक है । यह दोषों से मुक्ति का बहुत सरल उपाय है। मोक्ष मार्ग से विपरीत भाव आवृत्ति भाव होते हैं। लगे हुए दोषों की आलोचना आवश्यक है। यदि अपने दोष को नगण्य मान लिया तो कभी दोष मुक्त नहीं हो सकेंगे। इससे हमारा विकास, साधना की गति रुक जाएगी। चटकनी भले ही छोटी है लेकिन पूरा दरवाजा लगाए रखती है। ठीक ऐसे ही छोटे दोष पर भी ध्यान दें। प्रमाद को परिभाषित करते हुए बताया कि जिन वस्तुओं के बिना न रहा जाए वह नशा कहलाता है। अनुकूल विषय पर रति होना , खुश होना या फिर प्राप्ति में सहयोग करने वाले पर राग पैदा होना प्रमाद कहलाता है। प्रतिकूल विषय या विषय देने वाले के प्रति द्वेष का भाव रखना भी प्रमाद है। विषय चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल उसने रमणता ,प्रमाद अवस्था है।
पूज्य श्री सुहासमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि शरीर का आधार आहार है। भगवान की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के समाचारी अध्यन में फरमाया है की साधु छह कारणों से आहार करता है उससे एक कारण है संयम की रक्षा के लिए । इसीलिए ऐसे उत्तम साधु-साध्वीजी को किया गया आहार दान सुपत्रदान कहलाता है । दान देने की भावना से मोक्ष का मार्ग खुलता है। भोजन करने से पहले दिशा का अवलोकन करें कि घर के बाहर कोई साधु साध्वी हो तो उन्हें आहार दान कर सकूं। द्वार पर प्रतीक्षा करना की कोई साधु भगवन मेरे द्वार पर पधारे हैं क्या ? एवं थाली पिरोस दे तब भी इंतजार करना चाहिए। साधु भले ही न आए लेकिन भावना दान की होना चाहिए। सुपात्र दान भी आराधना की सबसे सरल पद्धति है।


