यज्ञशाला की परिक्रमा मात्र करने से चारों पुरुषार्थ की सहज प्राप्ति संभव-चिन्मयानंद
विमानतल मार्ग स्थित श्री श्रीविद्याधाम पर महारूद्र महायज्ञ के आयोजक आचार्यों का सम्मान
इंदौर, । यज्ञ से बढ़कर सनातन वैदिक धर्म में दूसरा कोई कर्म नहीं है। यज्ञशाला की परिक्रमा मात्र से मनुष्य के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थ की सहज प्राप्ति हो जाती है। जहां कहीं यज्ञ होता है, वह भूमि समस्त दोषों से मुक्त मानी जाती है। यज्ञ भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा का गौरवशाली हिस्सा है।
ये दिव्य विचार हैं श्री श्रीविद्याधाम के महामंडलेश्वर स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के, जो उन्होंने ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी गिरिजानंद सरस्वती ‘भगवन’ के शिष्यों द्वारा गत 10 से 19 फरवरी तक कन्नौद स्थित जोड़ नदी के दक्षिणेश्वर हनुमान धाम पर हनुमानजी की दिव्य प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा, ग्यारह कुंडीय महारूद्र महायज्ञ एवं श्रीराम कथा के दिव्य अनुष्ठान के आयोजक आचार्य पं. आदर्श गुरूजी एवं आचार्य ब्रह्मचारी पं. प्रशांत के सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आशीर्वचन देते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर विमानतल मार्ग स्थित श्री श्रीविद्याधाम परिसर में आयोजित कार्यक्रम में निरंजनी अखाड़े के संतों, म.प्र. ज्योतिष परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. रामचंद्र शर्मा वैदिक एवं अन्य वरिष्ठ संतों के सानिध्य में आचार्यद्वय का सम्मान किया गया। प्रारंभ में विद्याधाम परिवार की ओर से सुरेश शाहरा, पं. दिनेश शर्मा, राजेन्द्र महाजन, रमेश पसारी सहित न्यासी मंडल की ओर से भी आचार्यद्वय का सम्मान किया गया तथा भगवती मां पराम्बा को भोग भी समर्पित किया गया। पूज्य ‘भगवन’ द्वारा स्थापित परंपरा के अनुरूप जोड़ नदी तट पर हुए इस अनुष्ठान में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।


