धन का सदुपयोग धर्म और परमार्थ के कामों में करेंगे तो मौत के बाद भी यश-कीर्ति बनी रहेगी

 

धन का सदुपयोग धर्म और परमार्थ के कामों में
करेंगे तो मौत के बाद भी यश-कीर्ति बनी रहेगी

इंदौर । सदकर्म करने के लिए किसी मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए। काल सबके पीछे लगा हुआ है। काल की पकड़ से कोई भी बच नहीं सकता, लेकिन यह भी याद रखें कि काल किसी भी आंख से नहीं दिखाई देता है, उसे तो ज्ञान से ही समझा जा सकता है। जीवन यापन के लिए धन की जरूरत सबको होती है, लेकिन उस धन का कितना अंश हम धर्म पर खर्च करें, यह हमारे संस्कारों पर निर्भर होता है। धन किसी के भी साथ नहीं जाएगा। धन का सदपुयोग धर्म और परमार्थ के कार्यों में करेंगे तो मृत्यु के उपरांत भी हमारी यश-कीर्ति बनी रहेगी। धन को व्यर्थ खर्च करने के बजाय धर्म के विस्तार में निवेश करें तो आने वाली पौध भी समाज और राष्ट्र के नव निर्माण में सहयोगी बन सकेगी। धन से हम केवल अपना या अपने बाद वाली पीढ़ी का उद्धार कर सकते हैं, लेकिन धर्म से कई पीढ़ियों का कल्याण संभव है।
ये प्रेरक विचार हैं जगदगुरू शंकराचार्य भानपुरा पीठाधीश्वर स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ महाराज के, जो उन्होंने सोमवार को बिजासन रोड स्थित प्राचीन अखंड धाम आश्रम पर चल रहे 56वें अ.भा. अखंड वेदांत संत सम्मेलन की धर्मसभा में व्यक्त किए। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, समाजसेवी प्रेमचंद गोयल, विजय कृष्णा गोयल, बालकृष्ण छावछरिया सहित अनेक गणमान्य बंधुओं ने भी  संत सम्मेलन में पहुंचकर शंकराचार्य सहित अन्य संत-विद्वानों का स्वागत किया। आयोजन समिति की ओर से श्रीमती महाजन, प्रेमचंद गोयल एवं बालकृष्ण छावछरिया का भी सम्मान किया गया। संत सम्मेलन में अखंड धाम के महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी चेतन स्वरूप, वृंदावन के महामंडलेश्वर स्वामी जगदीश्वरानंद, वृंदावन से आए पं. हिमांशु महाराज एवं उज्जैन से आए स्वामी वेदानंद, रतलाम से आए स्वामी देव स्वरूप, सारंगपुर से आई साध्वी अर्चना दुबे, भीलवाड़ा के चिन्मय धाम आश्रम से आई साध्वी पद्माश्री, आचार्य पं. कल्याणदत्त शास्त्री ने भी अपने ओजस्वी विचार व्यक्त किए। जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी ज्ञानानंद तीर्थ और उनके उत्तराधिकारी स्वामी वरुणानंद तीर्थ ने मुख्य रूप से संत सम्मेलन, देश के वर्तमान हालात एवं अन्य मुद्दों पर अपने विचार रखे। संचालन किया स्वामी जगदीश्वरानंद ने। प्रारंभ में आयोजन समिति की ओर से अध्यक्ष हरि अग्रवाल, महासचिव सचिन सांखला, सचिव भावेश दवे, ठा. विजयसिंह परिहार, सीए विजय गोयनका, राजेन्द्र गर्ग, निरंजन पुरोहित, पलकेश कछवाह, ओमप्रकाश सांखला, ओम कछवाह, मुरलीधर धामानी, राजेन्द्र सोनी आदि ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। गुरुवंदना सुश्री किरण ओझा ने प्रस्तुत की। आभार माना सचिन सांखला ने।
*आज हजारों दीपों से होगी महाआरती* – अखंड धाम आश्रम के संस्थापक ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद महाराज की 56वीं पुण्यतिथि पर मंगलवार 2 जनवरी को सुबह नौ बजे छप्पन भोग समर्पित किए जाने के बाद संत सम्मेलन की प्रक्रिया प्रारंभ होगी, जो दोपहर 12 बजे तक चलेगी। दोपहर 12 बजे हजारों दीपों से महाआरती की जाएगी। आयोजन समिति के अध्यक्ष हरि अग्रवाल एवं महसचिव सचिन सांखला ने बताया कि संत सम्मेलन में आने वाले श्रद्धालु अपने-अपने घरों से दीपों की थाली सजाकर लाएंगे और आरती करेंगे। इसके साथ ही 56वें संत सम्मेलन का समापन होगा।
*प्रवचन*- साध्वी अर्चना दुबे ने कहा कि संतों की वाणी में सबके कल्याण का भाव निहित होता है। संत जीवात्मा के लिए रोपे गए उस पौधे की तरह होते हैं, जो अंकुरित बीज से बाद में वृक्ष बनकर सबको फल-फूल और छायां देते हैं। सदगुरू की शरण में आने वाले का अंतःकरण पवित्र और निर्मल हो जाता है। सदगुरू और शास्त्र हमें आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं। अखंड धाम के महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी चेतन स्वरूप ने कहा कि मनुष्य जीवन पानी के बुलबुले की तरह है। जब तक जीवन है, तब तक अपने मन को ईश्वर के प्रति भजन,पूजन और कीर्तन में भी लगाए रखें, तभी कल्याण होगा। मनुष्य की योनि मिलना देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। सदगुरू हमें सदमार्ग पर ले जाते हैं। संत और महापुरुषों का जीवन दूसरों के लिए ही होता है। भानपुरा पीठ के उत्तराधिकारी स्वामी वरुणानंद तीर्थ ने कहा कि मन निर्मल होगा तो राग-द्वेष पास नहीं फटकेंगे। प्रथम भक्ति सत्संग ही होती है। नित्य एवं निरंतर आराधना साधना का अभ्यास करेंगे तो कल्याण होकर रहेगा। उज्जैन से आ स्वामी वेदानंद ने कहा कि इंद्रियों के ज्ञान से ईश्वर को जाना जाता सकता है। संतों की वाणी हमें ईश्वर की साधना और आराधना के लिए प्रेरित करती है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन ने कहा कि अब मेरे लिए संतों के प्रवचन सुनने का समय आ गया है। शांति से संतों के सानिध्य में बैठे और उनके आशीष वचन सुनें – मैंने बहुत काम कर लिए हैं अब मैं संतों की वाणी सुनकर शांति से रहना चाहती हूं।