कंस और रावण जैसी प्रवृत्तियों के मुकाबले के लिए समाज को संगठित बनाएं – योगेश्वरदास

कंस और रावण जैसी प्रवृत्तियों के मुकाबले के लिए समाज को संगठित बनाएं – योगेश्वरदास

शपथ लेने के बाद इंदौर आते ही सबसे पहले भागवत कथा में पहुंचे कैलाश विजयवर्गीय

इंदौर, । भगवान कृष्ण ने दुष्टों के नाश के लिए हिंसा का प्रयोग किया, लेकिन उनकी हिंसा में विवेक और समाज के प्रति कल्याण का भाव था। सनातन संस्कृति किसी का अनादर और अपमान नहीं करती, इसीलिए भारतीय संस्कृति को सनातन कहा गया है। हमारे कर्मों में सदाचार, सेवा और परमार्थ का चिंतन ही सच्चा भागवत धर्म है। कंस व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति का नाम है। आज भी समाज में कंस और रावण जैसी प्रवृत्तियां मौजूद हैं। उनके मुकाबले के लिए समाज को संगठित होने की जरूरत है। नर में नारायण के दर्शन का भाव जब तक हमारे अंतर्मन में नहीं बैठेगा, हमारी पूजा और तीर्थ यात्रा अधूरी ही रहेगी। भगवान भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं।
लोहारपट्टी स्थित श्रीजी कल्याण धाम, खाड़ी के मंदिर पर उक्त दिव्य विचार भागवताचार्य पं. योगेश्वरदास ने शुक्रवार को राधा रानी महिला मंडल के सहयोग से चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में श्रीकृष्ण रुक्मणी विवाह प्रसंग के दौरान व्यक्त किए। कथा में कृष्ण रुक्मणी विवाह का उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। राज्य के केबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी गुरुवार शाम कथा में आकर उत्सव में भाग लिया, बल्कि भक्तों को भजन भी सुनाया। महामंडलेश्वर स्वामी रामचरणदास महाराज के सानिध्य में विजयवर्गीय ने भगवान और बाल-गोपाल की पूजा-अर्चना भी की। भोपाल में शपथ लेने के बाद इंदौर आते ही गुरुवार शाम को विजयवर्गीय सबसे पहले लोहारपट्टी में चल रही भागवत कथा में पहुंचे और पूरे उत्साह के साथ उत्सव में शामिल होकर भजन भी सुनाया। कथा शुभारंभ के पूर्व यजमान समूह की ओर से श्रीमती वर्षा शर्मा, उर्मिला प्रपन्न, मंजू शर्मा, ज्योति शर्मा प्रफुल्ला शर्मा, हंसा पंचोली, कामाख्या, हेमलता वैष्णव, मधु गुप्ता आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। अतिथियों का स्वागत पं. पवन शर्मा, पं. राजेश शर्मा, राजेन्द्र गर्ग, अशोक चतुर्वेदी, महंत यजत्रदास आदि ने किया। संयोजक पं. पवन शर्मा ने बताया कि भागवत ज्ञान यज्ञ का यह क्रम 30 दिसम्बर तक प्रतिदिन दोपहर 3 से सायं 7 बजे तक जारी रहेगा। शनिवार, 30 दिसम्बर को सुदामा चरित्र जैसे उत्सव भी मनाए जाएंगे। मंदिर का वार्षिक अन्नकूट महोत्सव 31 दिसम्बर रविवार को आयोजित होगा।
भागवताचार्य योगेश्वरदास ने कहा कि भागवत केवल ग्रंथ नहीं, भारत भूमि का धर्म भी है। जीवन का ऐसा कोई सूत्र नहीं, जिसका समाधान भागवत में नहीं हो। भगवान कृष्ण ने पूतना से लेकर कंस तक के वध किए, लेकिन उनकी हिंसा में समाज के प्रति कल्याण का भाव था। कंस किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का नाम है। समाज में आज भी कंस और रावण की प्रवृत्तियां मौजूद हैं। उनके नाश के लिए कृष्ण और राम का अवतार जब होगा, तब होगा लेकिन समाज को संगठित होकर ऐसी राक्षसी प्रवृत्तियों का मुकाबला करने के लिए तत्पर रहना होगा। भागवत शस्त्र भी है और शास्त्र के प्रयोग की इजाजत भी देता है। भागवत का पहला सूत्र यही है कि बहुत कम समय के जीवन में हम संतुष्ट और प्रसन्न रहने का पुरुषार्थ करें। धर्म सभा के साथ गृहसभा की जिम्मेदारी भी निभाएं और परमार्थ, सदभाव, अहिंसा एवं सहिष्णुता का विवेकपूर्ण प्रयोग करें, यही धर्म का सही स्वरूप होगा।