रतलाम -उक्त उदगार आचार्य श्रृंगेरी पीठ आत्मानंद जी सरस्वती ने रामचरितमानस पर ब्राह्मण बोर्डिंग स्थित महर्षि परशुराम ब्राह्मण सहकारी साख संस्था पर अमृत प्रवचन देते हुए कही आज के प्रेरक प्रसंग में रामसेतुबंध की स्थापना पर विशेष रूप से बोलते हुए कहा कि राम सेतु बंध की स्थापना में दो प्रकार के रास्ते होते हैं एक भक्ति पथ और एक निष्काम कर्म पथ भक्ति पथ जिसमें ईश्वर की पूर्ण शरणागति मानकर देवताओं के भरोसे रहना है दूसरा पक्ष है कर्म कि प्रधानता को मानकर निष्काम कार्य को पूर्ण करना है यहां पर प्रभु श्री राम भक्ति एवं कर्म पथ के दोनों किनारों को जोड़ कर सेतु का निर्माण करते हैं और मानस में हम उसे राम सेतु के रूप में पढ़ते हैं प्रभु श्री राम भवसागर के उन दोनों किनारो को राम सेतु के माध्यम से जोड़ते हैं मानस में प्रभु ने जहां एक ओर भक्ति भाव से समुद्र कि आराधना की जब वह स्वीकार नहीं हुई तब कर्म भाव से लक्ष्मण जी से समुद्र को सुखाने के लिए धनुष मांगा
इसी राम सेतु बंध के निर्माण पर आचार्य श्री ने बताया कि राम सेतु निर्माण विशेषज्ञ नल व नील ज्ञान और वैराग्य का प्रतीक है ज्ञान मार्ग से अहंकार को मिटाकर और वैराग्य भाव से ममता को जीतकर जीवन में राम सेतुबंध बनाया जा सकता है जब पानी मे राम नाम लिखने पर पत्थर भी तर जाते हैं तो हमारे भी कर्म फल के जो पत्थर रुपी कष्ट होते हैं उसे भी राम नाम जाप कर इस भवसागर को पार किया जा सकता है आचार्य श्री ने राम नाम की महिमा बताते हुए कहा कि राम महामंत्र है और मानस की कृपा से और जीवन के सभी समस्याओं का हल तभी मिल सकता है जब श्रोता राम चरित मानस के किसी भी चरित्र को अपने आप में उतार लें और उसके साथ सदगुरु देव की सत्संगति अनिवार्य है राम नाम के आश्रय से ज्ञान भक्ति और कर्म स्वयं चलकर भक्त के पास आते हैं इसलिए राम मंत्र को सर्वश्रेष्ठ माना है और इस महामंत्र को शिवजी भी जपते हैं आचार्य श्री ने कहा कि रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं यह हमारा पावन इतिहास है जिसके पठन-पाठन से मानव चरित्र उज्जवल एवं निर्मल बनता है रामचरितमानस में उल्लेख है कि हमारे सभी ऋषिगण
धर्म -ज्ञान और विज्ञान के प्रगाढ़ विद्वान थे उनके द्वारा किए गए शोध पर वर्तमान का विज्ञान कार्य कर रहा है हनुमान जी अंगद ज्ञान वैराग्य शौर्य भक्ति और शक्ति के प्रतीक है जब हनुमान जी रावण के यहां राम दूत बनकर गए तो उन्होंने भक्ति विवेक सहनशीलता का परिचय दिया लेकिन जब अंगद रावण के यहां राम दूत बनकर गये तो उन्होंने अपने शोर्य का परिचय दिया है आचार्य श्री ने मेघनाथ को काम का प्रतीक बताया और कहा कि मेघनाथ के सारथी और रथ वासना का प्रतीक है काम रूपी वासना को भक्ति से मार भी दिया जाए तो कामवासना पुनः प्रबल हो जाती है परंतु प्रभु के भक्त को कामवासना मार नहीं सकती है तभी मेघनाथ ने लक्ष्मण जी रूपी भक्त को केवल मूर्छित कर पाए आचार्य श्री ने आज राम सेतु बंध एवं लंका कांड में मेघनाथ एवं लक्ष्मण जी के युद्ध पर अपने सभी भक्तों को अपनी अमृतम वाणी से कृतार्थ किया
सहकारी साख संस्था के सत्येन्द्र जोशी ने बताया कि विगत 6 माह से प्रति रविवार को सुबह 9 से 10 बजे राम चरित मानस पर आचार्य श्री के अमृत वचन से कृतार्थ कर रहे हैं हमारा प्रयास है कि हमारी आध्यात्मिक विरासत और इतिहास मानवीय, दैविय गुणो के रहस्यों से युवाओं को अवगत कराया जाये जिससे उनमें संस्कार शिक्षा और ज्ञान विज्ञान वैराग्य का विकास हो । आज प्रवचन में संदीप व्यास, राजेन्द्र जोशी, विजय हेमकांत शर्मा,नवनीत मेहता, जितेन्द्र मोहन शर्मा, अरविंद मिश्रा, सुनील गौतम, सुनील दुबे, संजीव शर्मा, श्रीमती अनुसुइया जोशी, श्रीमती अनीता गौतम सहित भक्त जन उपस्थित थे।