हिन्दी वैश्विक स्तर की भाषा के रूप में स्थापित है – डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला

रतलाम । हिन्दी विश्व में अपनी विकास यात्रा के दौरान निरंतर शिखर की ओर उत्तरोत्तर अग्रसर हो रही है। परिवार के संस्कार एवं वातावरण अच्छा रहता है तो हमारे बच्चे विदेशों में भी भारतीय संस्कृति को भी नहीं भुलते और अपने आचरण और व्यवहार में हिन्दी को उपयोग में लाते है । हिन्दी की इन्ही विशिष्टताओं के कारण विश्व में अपना कीर्तिमान स्थापित कर रही है ।
उक्त बात शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला ने साहित्यिक संस्था अनुभूति के तत्वावधान में नूतन साहित्यिक कार्यक्रम की श्रृंखला में विश्व हिन्दी दिवस दिं. 10 जनवरी 2026 के उपलक्ष्य में नृसिंह मंदिर नागरवास में आयोजित विचार संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में कहीं ।
कार्यक्रम में चिंतक एवं विदुषी सुश्री शिवकांता भदौरिया ने देवनागरी लिपि वर्णमाला के एक-एक स्वर व्यंजन की ऐतिहासिकता के साथ तर्क एवं तथ्य सहित अपनी बात कहते हुए हिन्दी को वैदिक एवं संस्कृत भाषा से जोड़ते हुए हिन्दी का महत्व प्रतिपादित किया । डॉ. श्रीमती शोभना तिवारी निदेशक डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन स्मृति शोध संस्थान ने कहा कि श्री गणेश अर्थव शीर्ष में देवनागरी लिपि की सारी विशेषाएं ध्वनित होती है । विश्व में हिन्दी अपनी वैज्ञानिकता और सरलता के कारण उच्च स्तर पर स्थापित हो रही है । वरिष्ठ गीतकार श्री हरिशंकर भटनागर ने हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखंडो का वर्णन करते हुए हिन्दी की विकास यात्रा की महत्ता को रेखांकित किया। श्री दिनेश कुमार जैन एवं श्री अशोक मेहता ने हिन्दी के उज्जवल भविष्य के लिए अपने प्रेरणादायी विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि समीक्षक श्री प्रणयेश जैन ने कहा कि हिन्दी का किसी भाषा से बैर नहीं है हिन्दी अपने गौरवमयी इतिहासके आधार पर विश्व में मान्य होती रही है और भविष्य में भी ऊंचाई पर पहुंचेगी। आज हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है । आपने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि कवि गोष्ठियों में समीक्षा आलोचना को हाशिये पर रख दिया गया है जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है क्योंकि समालोचना से ही रचनाओं में निखार आता है ।
संस्था अध्यक्ष डॉ. मोहन परमार ने विचार गोष्ठी का संचालन करते हुए कहा कि 11 वीं शताब्दी से हिन्दी में नए-नए रूप परिवर्तन होते रहे और हिन्दी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों ने अपने स्तर से विश्व की वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए कई प्रयास किए है उसी का यह सफल परिणाम है कि आज हिन्दी विश्व के करीब 180 विश्व विद्यालयों में पठन पाठन एवं शोध कार्य हो रहा है। हिन्दी जनसंचार क्रांति के कारण इंटरनेट, सॉफ्टवेयर, याहू, गूगल, एमएसएम सब हिन्दी में उपयोग हो रहे है। यह हिन्दी की सबसे बड़ी सफलता है ।
कार्यक्रम में रामचन्द्र फुहार, शिवराज जोशी, कैलाश वशिष्ठ, श्याम सुंदर भाटी, रामचन्द्र गेहलोत (अम्बर), प्रकाश हेमावत आदि उपस्थित रहे । कार्यक्रम का आभार मुकेशसोनी ने प्रकट किया।