संयम और तप से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त : श्री 108 मुनि सद्भाव सागर जी

रतलाम 19 अगस्त । श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
मंगल प्रवचन में श्री श्री 108 मुनि श्री सद्भाव सागर जी मसा. ने कहा कि“जीव को मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम से युद्ध करना पड़ता है और तप से भी युद्ध करना पड़ता है। तप बारह प्रकार के बताए गए हैं, जिनमें छह बाह्य और छह आभ्यंतर तप आते हैं। तप की भावना करो, तप श्रेष्ठ है” — यह बात मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कही।

बारह प्रकार के तप

मुनि श्री ने बताया कि बाह्य तप में अनशन (उपवास), उनोदरी (अल्प आहार), विविक्त शय्या (एकांतवास), काय क्लेश (शारीरिक कष्ट सहना), ऋतुशैल (ऋतु का ताप सहना) और इन्द्रिय संयम आते हैं। आभ्यंतर तप में प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्त्य (सेवा), स्वाध्याय, ध्यान और कायोत्सर्ग को स्थान दिया गया है।

आहार और संज्ञा पर संयम आवश्यक

उन्होंने कहा कि आहार संज्ञा जब प्रदीप्त होती है तो असंयम की ओर ले जाती है। चार संज्ञाएँ होती हैं – आहार संज्ञा, भय संज्ञा, परिग्रह संज्ञा और शरीर के प्रति आसक्ति संज्ञा। परिग्रह संज्ञा से लवलीन जीव अपनी श्रद्धा खोकर प्राण तक गँवा देता है।

धैर्य से संकट दूर होते हैं

मुनि श्री ने कहा कि धर्म का मूल श्रद्धा है। जीवन में कभी अशुभ भाव आ जाए तो धैर्य रखना चाहिए। संकट और कष्ट आने पर भी धैर्य धारण करने से अशुभ योग टल जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब पुण्य प्रबल होता है तो हिंसक जीव भी हानि नहीं पहुंचा पाते।

आदिनाथ ने अनशन तप से पाया भगवान पद

मुनि श्री ने बताया कि जिन शासन में अनशन को विशेष महत्व दिया गया है। “इसी तप से आदिनाथ राजा भगवान बने। इसलिए तप की साधना ही जीव को परम लक्ष्य की ओर ले जाती है। उक्त बात अपने प्रवचन श्रृंखला में कहीं।जानकारी श्री चन्द्रप्रभ दिगम्बर जैन श्रावक संघ रतलाम के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।