


रतलाम। 18 अगस्त 2025– श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
मंगल प्रवचन में श्री श्री 108 मुनि श्री सद्भाव सागर जी मसा. ने कहा कि निर्वाण दीक्षा अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्रत्येक जीव को इसे ग्रहण करना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि निर्णय में ही सुख है और अनिर्णय में दुख है। गुरु की दृष्टि दूरगामी होती है, वह शिष्य को पहचान लेते हैं कि भविष्य में क्या होगा।
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में सब दिन एक समान नहीं होते। अच्छे-बुरे समय बदलते रहते हैं। किंतु दो काल ऐसे हैं जिन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए—पहला दीक्षा काल और दूसरा समाधि काल। दीक्षा का क्षण जीवन का सबसे पवित्र क्षण है, इसे हमेशा स्मरण रखना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि साधु का जीवन नट के जीवन के समान है, जो हर परिस्थिति में अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहता है। समाज कुछ भी कहे, लेकिन साधक को अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहना चाहिए। समय का महत्व समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब समझ नहीं थी तब समय था और जब समझ आई तो समय नहीं रहा। इसलिए समय की कद्र करें।
गुरुदेव ने परोपकार को सर्वोत्तम धर्म बताते हुए कहा कि परोपकारी वही है जो दूसरों के दुख को अपना दुख मानता है। आत्म साधना के साथ ही समाज उत्थान के लिए कार्य करना भी आवश्यक है। धैर्य को जीवन का सबसे बड़ा गुण बताते हुए उन्होंने कहा कि आगम के अनुसार जीवन जीना ही साधुता है।
प्रवचन के पूर्व पंकज भैया ने कहा कि जैन धर्म ही ऐसा है जो मनुष्य को भगवान बनाता है और मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है। उमंग भैया ने कहा कि जीव जिस सुख को बाहर ढूंढता है, वह वास्तव में उसके अंतर में ही है। संसार का सुख दर्पण में दिखने वाले मुख के समान है—जो दिखता तो है पर होता नहीं है। विकास भैया ने कहा कि यदि हम सम्यक आचरण अपनाएँ तो जीवन सुंदर बन जाएगा और मोक्ष मार्ग पर गति प्राप्त कर सकेंगे।
श्रवण संघ संयोजक मांगीलाल जैन ने बताया कि तीनों भैया जी की दीक्षा 3 नवंबर को जयपुर में आचार्य श्री 108 श्री सुंदर सागर जी महाराज साहब के सानिध्य में जैनेश्वरी दीक्षा दी जाएगी तथा आज प्रवचन के पश्चात खोल भराई का कार्यक्रम रखा गया। जिसमें समाज जनों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया।



