ज्ञान प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ नहीं, श्रद्धा जरूरी
– आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद के आशीर्वचन
इंदौर, जिस तरह पत्थर को शिल्पकार अपनी छैनी-हथौड़ी से सुंदर प्रतिमा में बदल देते हैं, उसी तरह गुरू भी एक कुम्हार की तरह हमें ज्ञान को संग्रहित करने की परिपक्वता और पात्रता प्रदान करते हैं। जब तक परिपक्वता नहीं आएगी, ज्ञान रूपी अमृत हमारे पास नहीं टिक सकता। विद्वानों ने गीता को योग कहा है तथा रामचरित मानस को प्रयोग। किताबी ज्ञान और शिक्षा तथा गुरू के सानिध्य में प्राप्त ज्ञान में बहुत अंतर है। शास्त्र सम्मत बातों को अपने जीवन में उतारेंगे तो हमारे अंतर्मन में विराजित प्रभु राम जागृत हो जाएंगे। ज्ञान पुरुषार्ष से नहीं, श्रद्धा से प्राप्त होगा।
ये प्रेरक विचार हैं वृंदावन के प्रख्यात संत आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी भास्करानंद महाराज के, जो उन्होंने बुधवार को गीता भवन स्थित सत्संग सभागृह में गोयल पारमार्थिक ट्रस्ट एवं गीता भवन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्रीराम कथा महोत्सव में व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व श्रीमती कनकलता-प्रेमचंद गोयल, कृष्णा-विजय गोयल, निधि-गोपाल गोयल, अमृता-आशीष गोयल, निधि-आनंद गोयल, स्वाति-अंकित गोयल एवं प्राची-आदित्य गोयल आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। श्रीराम कथा में 22 जनवरी को सबसे जबर्दस्त उत्सव में हनुमान चरित्र, राम राज्य अभिषेक एंव 56 भोग का विशिष्ट आयोजन होगा। समूचा महोत्सव सभी प्रबुद्ध और निष्ठावान भक्तों के लिए खुला है, लेकिन प्रवेश पहले आएं पहले पाए आधार पर ही संभव होगा।
गीता भवन में श्रीराम कथा का महोत्सव का यह दिव्य आयोजन 22 जनवरी तक जारी रहेगा।
श्रीमुख से मधुर भजनों की प्रस्तुतियां भक्तों को आल्हादित बनाए हुए हैं। महोत्सव के दौरान गीता भवन स्थित सभी देवालयों, विशेषकर राम दरबार मंदिर में भगवान का आकर्षक श्रृंगार कर प्रतिदिन 56 भोग समर्पित करने की तैयारियां की गई है। महोत्सव में आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए यहां विशाल अन्नकूट महोत्सव का आयोजन होगा। 22 जनवरी को अयोध्या के रामलला मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के वक्त यहां भी रंगारंग आतिशबाजी और दीपों से सजावट का अनूठा दृश्य देखने को मिलेगा। इसी दिन संध्या को भी बाहर से बुलाई गई टीम द्वारा आकर्षक आतिशबाजी और अन्य दिलचस्प आयोजन होंगे।
स्वामी भास्करानंद ने कहा कि हमारे ऋषि –मुनियों ने बुद्धि की शुचिता और पवित्रता को बहुत अधिक महत्व दिया है। बुद्धि पवित्र होगी तभी हमारे हृदय में विराजमान परमात्मा से हमारा साक्षात्कार होगा। हृदय में ईश्वर होते हुए भी बुद्धि की मलीनता के कारण ही हम परमात्मा से साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने मानस में सबसे पहले विद्या की देवी सरस्वती की वंदना की है। श्रद्धा और विश्वास के रूप में भवानी शंकर की वंदना की गई है। इन दोनों की कृपा इसिलए भी जरूरी है कि उनकी कृपा के बिना ईश्वर के दर्शन संभव नहीं है चाहे वह संसारी हो, साधक हो या कोई सिद्ध हो। हमारे मन की अपेक्षाएं और कामनाएं ही हमारे दुख का कारण है। बुद्धि यदि पवित्र होगी तो मन को बुरे कामों से रोक देगी। मन को बांधने का काम बुद्धि ही करती है। बुद्धि की पवित्रता ही अंतरमन के चक्षुओं को खोलती है। रोगग्रस्त और मलीन बुद्धि को निर्मल बनाए बिना परमात्मा का साक्षात्कार संभव नहीं है


